बुधवार, अक्तूबर 13, 2010

ज़िन्दगी में उसी की कमी रह गई

9 टिप्‍पणियां:

  1. वर्षा सारे शहर को भिगोती रही'
    ख़ुश्क मैं अओर मेरी गली रह गई।
    सुन्दर शे'र्। अच्छी ग़ज़ल्।

    उत्तर देंहटाएं
  2. ऊपर वाला भी एक निर्माता है..कई भंवर बनाता है..हम भी डूबते तैरते है..

    उत्तर देंहटाएं
  3. संजय दानी जी, हार्दिक धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  4. धन्यवाद! अरविन्द शुक्ल जी, डूबते तैरते ग़ज़ल कह जाती है मेरी चाहतै ......

    उत्तर देंहटाएं
  5. वो गगन में ठिकाने बनाने लगा
    मैं हवाओं में पर तौलती रह गई

    वाह

    और इस शेर को मैं ऐसे ले रहा हूं क्षमा करें ओर इजाजत दें

    वक्त ने कुछ गठानें तो खोली मगर
    हाथ में उसके बस शायरी रह गई

    उत्तर देंहटाएं
  6. आनन्द राठौर जी, हार्दिक धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  7. vo gagan me thhikaane banaane lagaa ,
    main havaaon me par taulti rah gai .
    behtareen shair hai -
    dushyant kumarji kee yaad aa gai -
    "Parinde ab bhi par taule hue hain ,hvaa me sansani ghole hue hain ,
    gazab hai sach ko sach kahte nahin hain ,
    hamaare "pair -han ",jhole hue hain .....
    hamaare hausle pole hue hain .
    veerubhai .

    उत्तर देंहटाएं