मंगलवार, दिसंबर 14, 2010

इक चांद है इस ख़त में

19 टिप्‍पणियां:

  1. सागर भी उसे भला लागे पर्वत भी उसे भाये।
    बहुत सुन्दर गज़ल , बधाई व आभार।

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  2. भूली हुई ग़ज़लों के साथ बीते दिनों की याद ...बहुत सुन्दर रचना ...

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  3. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  4. संजय कुमार चौरसिया जी, हार्दिक धन्यवाद!

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  5. रश्मि प्रभा जी, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद... !

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  6. संजय दानी जी, हार्दिक धन्यवाद!

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  7. संगीता स्वरुप जी,मेरे ब्लॉग पर फिर आने के लिए हार्दिक धन्यवाद! आभार।

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  8. संकेतों के झुरमुट में संवादों का खिलना...लाज़वाब अहसास..बहुत सुन्दर गज़ल ...

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  9. शर्मा जी,मेरे ब्लॉग से जुड़ने के लिए हार्दिक धन्यवाद!आपका स्वागत है।

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  10. तुमको भी उजालों के सपने तो नहीं आये
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ।

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  11. निवेदिता जी,मेरे ब्लॉग पर आने के लिए हार्दिक धन्यवाद!

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  12. शारदा अरोरा जी, हार्दिक धन्यवाद!

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  13. सुन्दर,बहुत सुन्दर।साधुवाद!

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  14. Your Gazals are so nice........very beautiful ghazal Lahzab feeling ...want to no some thing about Electro-Homoeopthy Medicine did you write any books on this......i am also intrested in EH

    Rahul

    rahu.musu@gmail.com

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  15. "man daud ke beete din muthhthhi me uthhaalaaye ,
    bhooli hui gazlon ko jab saanjh koi gaaye ,
    varshaa kee gazlon ko jab saanjh koi gaaye "
    veerubhai .

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