शनिवार, अगस्त 18, 2012

बूझती रह गई


13 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीया डॉ वर्षा सिंह जी आपकी पंक्तियाँ सदा सन्देश देती है आज कुछ पीड़ा सी दिखी मेरी चार लाइन आपको समर्पित

    अचानक अनायास जुड़ जाते हैं हादसे हमसे
    करें प्रेम कि बारिस बादल आसमां पे छाएंगे
    रहेगा आँगन ये हरा भरा हर दिन
    बादल गरजेंगे नहीं बरसना होगा

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  2. ' एक बादल न 'वर्षा' का अपना हुआ
    जिन्दगी आग से जूझती रह गई '
    बहुत सुन्दर...!

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  3. आज 20/08/2012 को आपकी यह पोस्ट (दीप्ति शर्मा जी की प्रस्तुति मे ) http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!

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  4. छोटी सी सुन्दर सी रचना

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  5. ' एक बादल न 'वर्षा' का अपना हुआ
    जिन्दगी आग से जूझती रह गई '
    बहुत सुन्दर रचना...!

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  6. सोमवार, 20 अगस्त 2012एक बादल वर्षा का न हुआ ,ज़िन्दगी आग से जूझती रह गई ,बढ़िया प्रस्तुति है ..... .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    सर्दी -जुकाम ,फ्ल्यू से बचाव के लिए भी काइरोप्रेक्टिक

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  7. वाह ... कमाल का मुक्तक है .... लाजवाब ....

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