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मंगलवार, दिसंबर 08, 2020

किसान | अन्नदाता | ग़ज़ल | शायरी | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

ग़ज़लों के आईने में किसान
             - डॉ. वर्षा सिंह

हमारा देश कृषि प्रधान देश है और किसान हमारे अन्नदाता हैं। परिस्थितियोंवश इन दिनों किसान आंदोलन से पूरे देश प्रभावित हो रहा है। नित नए समाचार, बहसें, दलीलें और चर्चाएं... नए कृषि कानूनों को वापस लेने और फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी की मांग को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं ।
आज 08 दिसम्बर को किसान संगठनों के आह्वान पर "भारत बंद" की सरगर्मी है। 
तो प्रिय ब्लॉग पाठकों, मैं आज यहां अपने इस ब्लॉग "ग़ज़लयात्रा" में प्रस्तुत कर रही हूं हमारे अन्नदाता किसानों के प्रति समर्पित कुछ चुनिंदा कवियों/शायरों की शायरी और ग़ज़लें।

हलाल रिज़्क़ का मतलब किसान से पूछो 
पसीना बन के बदन से लहू निकलता है
      - आदिल रशीद

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शाइ'र हूँ मैं लफ़्ज़ों का मसीहा
ऐ काश मैं इक किसान होता
      - रिफ़अत सरोश

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हंसिये की ज़ंग छुड़ाने में रत हैं किसान
है नई नोक दे रहा है मजूर कुदाली को
नभ बसा रहा है नए सितारों की बस्ती
भू लिए गोद में नए ख़ून की लाली को.
            - गोपालदास 'नीरज'

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तिरे किसान के सीने में हसरतों का हुजूम
तिरी फ़ज़ाओं में हर बेटी माँ बहन मग़्मूम
   - यूसुफ़ राहत

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ईंट उगती देख अपने खेत में
रो पड़ा है आज दिल किसान का
     - इरशाद ख़ान सिकंदर

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बारिश में खेत ऐसी तरह से नहाए है
रौनक़ हर इक किसान के चेहरे पे आए है
    - नज़ीर बनारसी

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बनाएँगे नई दुनिया किसान और मज़दूर
यही सजाएँगे दीवान-ए-आम-ए-आज़ादी
    - फ़िराक़ गोरखपुरी

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मिला न खेत से उस को भी आब-ओ-दाना क्या
किसान शहर को फिर इक हुआ रवाना क्या
    - सौरभ शेखर

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बारिशें जाड़े की और तन्हा बहुत मेरा किसान
जिस्म और इकलौता कम्बल भीगता है साथ साथ
     - परवीन शाकिर

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गंदुम की बालियों से बहुत रौशनी हुई
इस रौशनी से क़र्ज़ न उतरा किसान का
     - अहमद फ़ाख़िर

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मैं वो किसान हूँ खेती पे बर्क़ ने जिस की
दुआ जो मेंह के लिए की तो आग बरसाई
     - शाद लखनवी

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मशीन बोना है जिन का पेशा उन्हें ज़मीं बेच दी है तुम ने
किसान हो कर ख़ुद अपनी मिट्टी पलीद करने की ठान ली है
   - ऐनुद्दीन आज़िम

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हो 'फ़ख़्र' ख़ाक मुझे क़ौम की तरक़्क़ी पर
जो फ़र्द-ए-क़ौम ये मज़दूर और किसान नहीं
    - फख्र ज़मान

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वो अन्नदाता है, जिसे कहते किसान हैं
यूं तो नहीं है कुछ भी, लेकिन महान हैं
   - अनिल त्रिपाठी

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तमाम एक सी शक्लें हैं हिंदिसों की तरह
किसान हैं जो अभी खेतियों से पलटे हैं
  - अली सरदार जाफ़री

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न ऐसे लौंग घुमा नाक में हसीं मुटियार
जो हल चलाते हैं कोई किसान गिर जाए
  - मुसव्विर सब्ज़वारी

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किसान खेतों से घर न जा पाया सोचता था
इकट्ठी पहले मैं उम्र-भर की कपास कर लूँ
     - ज़ीशान साजिद

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ज़मीन-ए-कर्ब की हर फ़स्ल का जो मालिक है
हमारे दर्द के रिश्ते इसी किसान से हैं
    - रज़ा मौरान्वी

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अभी किसान-ओ-कामगार राज होने वाला है
अभी बहुत जहाँ में काम-काज होने वाला है
   - फ़िराक़ गोरखपुरी

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तमाम फ़सलें उजड़ चुकी हैं न हल बचा है न बैल बाक़ी
किसान गिरवी रखा हुआ है लगान पानी में बह रहा है
   - शकील आज़मी

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ये चारा-गाह ये रेवड़ ये मवेशी ये किसान
सब के सब मेरे हैं सब मेरे हैं सब मेरे हैं
    - साहिर लुधियानवी

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किसान दिल-शाद खेत आबाद हैं वहाँ के
सफ़ेद भेड़ें हैं सब्ज़ चारे हैं उस किनारे
   - शब्बीर शाहिद

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मिले नया सब को एक जीवन चमन खिलें खेत लहलहाएँ
हवा मोहब्बत का राग अलापे किसान धरती के गीत गाएँ
    - नज़ीर बनारसी

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फ़सलों का ख़्वाब भूख की आँखों में रह गया
गाँव के खेत खा गए लेकिन किसान तक
     - ताैफ़ीक़ साग़र

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काँधे पर हल धरे किसान। 
करता खेतों को प्रस्थान।।

मत कहना इसको इंसान।
यह धरती का है भगवान।।
  - डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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बाँझ हो जाती है ज़मीं नक़ल बाज़ार की करता है जब किसान 
सरकार को आता है पसीना पसीने की कमाई का भाव  जब माँगता है किसान।  
- रवीन्द्र सिंह यादव 

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किसान की कमर पर मार हथौड़ा ,
प्लास्टिक की बनी  सब्जी-तरकारी,
शौहरत की महक में मरी मानवता ,
दिखावे  में  डूबी  जनता  बेचारी, 
   - अनीता सैनी

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ज़िंदगी में आ गया  मसला बड़ा है
अन्नदाता आज सड़कों पर खड़ा है

जिस तरह सरहद पे रक्षक जूझते हैं
मुश्क़िलातों   से   हमेशा  वो लड़ा है

मूल्य मिल जाए फसल का, कर्ज़ उतरे
हो फ़सल अच्छी, यही दिल में जड़ा है

ख़ुदकुशी करना पड़े जब खेतिहर को
जान लो, वह  दौर  बेहद  ही  कड़ा है

 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
                
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सियासत नहीं हैं, किसानों की बातें।
तिज़ारत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

खेती, किसानी नहीं सब के बस की
नफ़ासत नहीं हैं, किसानों की बातें।

पसीना  बहाए,    लहू  को  सुखाए
शरारत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

भले ही  अंगूठा  लगा कर  जिए वो
ज़हालत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

जो हक़ मांगने को, उठाए वो बांहें
बग़ावत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

'शरद' वो नहीं हैं किसी के भी दुश्मन
अदावत नहीं  हैं,  किसानों की बातें।

             - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

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वो जो कड़वी ज़ुबान होते हैं, 
एक तन्हा मचान होते हैं.

चुप ही रहने में है समझदारी, 
कुछ किवाड़ों में कान होते हैं.

एक दो, तीन चार, बस भी करो, 
लोग चूने का पान होते हैं.

उम्र है लोन, सूद हैं सासें, 
अन्न-दाता, किसान होते हैं.

गोलियाँ, गालियाँ, खड़े तन कर,
फौज के ही जवान होते हैं. 
 
जो नहीं हैं रियाज़ के आदी,
एक टूटी सी तान होते हैं.
 
रख दिए साहूकार पे गिरवी,
हाथ खेतों की धान होते हैं.
           - दिगम्बर नासवा 

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नन्ही -नन्ही बूंदों ने जब अपना राग सुनाया 
व्याकुल किसान की व्याकुलता को ,हुलसाया -हर्षाया !

हल--बैलों की जुगल बंदी संग, धरती ने ली तान
झम -झमा झम , झम--झम ,झम--झम बरखा गाये गान !

हल चलाते कृषक अधरों पर ,खेल रही मुस्कान 
भूल गया वो ताप , पसीना , सूरज का अभिमान !

लहलहाती फसल करेगी जब ,अभिनन्दन ,सम्मान 
बीज -धरा का मिलन रखेगा ,परिश्रमी किसान का मान 
    - अरुणा 

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हर किसान कै फटी ज़ेब, पेटौ खाली
अपनी अपनी किस्मत के बटवारे हैं

कहैं मिठाई लाल कि ग़ाफ़िल सुगर भवा
दीवाली मा फूटे भाग हमारे हैं
    - चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’

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धरती के अंक से लग कर बिना कोई भेद किये 
सबकी एकता का सूत्र है जो भूमि पुत्र है वो 
       -यशवन्त माथुर

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मुँह अँधेरे किसान चल दिया
खेतो की ओर
जी तोड़ मेहनत नतीजा मुट्ठी भर
  - मीना भारद्वाज

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कीमत तो खूब बढ़ गई दिल्ली में धान की,
लेकिन विदा न हो सकी बेटी किसान की
    - सत्यप्रकाश

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और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी यानी इस ब्लॉग लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की ग़ज़लों से कुछ शेर ....

(1)
जहां पे आज रेत है, वहीं पे थी नदी कभी
जले थे प्रेम के दिये, हुई थी रोशनी कभी

उदास है किसान, कर्ज के तले, दबा हुआ
दुखों की छांव है वहां, रही जहां ख़ुशी कभी

अनेकता में एकता, ही हमारी शक्ति है
देशभक्ति की डगर, अलग नहीं रही कभी

जहां पे ”वर्षा” हो रही है, गोलियों की इन दिनों
वहां पे अम्नो-चैन की, बजेगी बांसुरी कभी
     - डॉ. वर्षा सिंह

और....

(2)

फांसी पे लटके बाप के शव से लिपट- लिपट
रोयी थी ज़ार-ज़ार वो बेटी किसान की

हल्कू हुआ है ज़िन्दा, हर रात पूस की
फ़सलों के बीच यादें टूटे मचान की

कुचले गए हैं कर्ज़ में कितने हसीन ख़्वाब
धरती सुना रही है गाथा लगान की
         - डॉ. वर्षा सिंह

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18 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (09-12-2020) को "पेड़ जड़ से हिला दिया तुमने"  (चर्चा अंक- 3910)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
      हार्दिक आभार 🙏
      मुझे प्रसन्नता है कि मेरी इस पोस्ट को आगामी कल की चर्चा में शामिल किया गया है।
      आपके इस अनुग्रह के लिए पुनः हार्दिक आभार 🙏

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद! इस विषय पर बड़े-बड़ों के बीच खुद को पाकर अच्छा लगा।

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    उत्तर
    1. माथुर जी,
      हार्दिक धन्यवाद मेरे ब्लॉग पर आने हेतु 🙏
      आपकी रचना श्रेष्ठ है, इसे अपनी पोस्ट में शामिल कर मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रही हूं। 💐🙏💐
      सदैव आपका स्वागत है।
      सादर,
      डॉ. वर्षा सिंह

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  3. श्रेष्ठ और विख्यात लेखकों के साथ मेरे सृजन को मंच प्रदान करने
    के लिए बहुत बहुत आभार वर्षा जी 🙏

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  4. प्रिय मीना जी ,
    आपका लेखन - सृजन भी किसी से कमतर नहीं है। बहुत अच्छा लिखती हैं आप।
    मेरे ब्लॉग पर सदैव आपका स्वागत है।
    हार्दिक शुभकामनाओं सहित,
    डॉ. वर्षा सिंह

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  5. इस अत्यावश्यक पोस्ट में ' यशवंत ' की पंक्तियों को भी शामिल करने हेतु धन्यवाद, आभार। आपकी कविता समेत सभी रचनाएं प्रासंगिक हैं।

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    उत्तर
    1. हार्दिक धन्यवाद विजय राजबली माथुर जी 🙏

      मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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  6. समसामयिक शानदार आलेख...

    मेरी ग़ज़ल को शामिल करने के लिए हार्दिक आभार 🌹🙏🌹

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  7. असाधारण पेशकश - - सराहनीय प्रस्तुतीकरण।

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  8. बेहतरीन सृजन..।सुंदर अभिव्यक्ति..।

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