रविवार, सितंबर 12, 2010

ज़िन्दगी थम के रह गई जैसे

7 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यंत गहराई है आप की रचनाओं में ... 'आँचल को धनि लिख

    देना' , 'तुम आओ तो होली है'... ' जहाँ औरतें नहीं'....और

    तो और (वर्षा) मौसम को अपने नाम के साथ जोड़कर हमें भी भिगो

    दिया अपने... बहुत खूब...

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  2. शारदा जी,
    आपका आना सुखद लगा ......
    मैं आपको धन्यवाद भर कहूं तो कम होगा, आपके अपनत्व ने मुझे भावविभोर कर दिया है।

    कृपया इसी तरह सम्वाद बनाए रखें।

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  3. संगीता स्वरुप जी,
    मेरी इस ग़ज़ल को नयी-पुरानी हलचल में शामिल करके आपने जो सम्मान दिया है और उत्साहवर्द्धन किया है, उस के लिए मैं आपकी बेहद आभारी हूं.बहुत-बहुत धन्यवाद.

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  4. यशवन्त माथुर जी,
    आपको हार्दिक धन्यवाद!

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  5. जिंदगी तो एक बेवफा ही है
    कब ,किसको,कहाँ नहीं छलती.
    खारे पानी में मत पकाया करो
    दाल इसमें कभी नहीं गलती.

    आपकी गज़ल बेमिसाल है.

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