गुरुवार, फ़रवरी 25, 2021

शिव कहां | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

शिव कहां !


- डॉ. वर्षा सिंह


कौन पढ़ता है किताबें आजकल 

वक़्त कहता 'फोर-जी' के साथ चल

 

कांपती हैं पत्तियां बीमार-सी 

अब हवा भी वायरस से है विकल 


इन दिनों लड़की से कहते हैं सभी 

हो गई है शाम, घर से मत निकल


चाहता कोई ज़रा झुकना नहीं

भूल थी, संवाद से निकलेगा हल


देखिए, फागुन में बारिश हो रही

कर लिया मौसम ने शायद दल-बदल


आंसुओं की नींव पर बनता नहीं

ख़ुशनुमा सा मुस्कुराहट का महल


जो स्वयं पर ही नहीं करते यकीं

वो कभी भी हो नहीं पाते सफल


सोचिए, कैसे मिले सदभावना 

द्वेष बो कर, द्वेष की मिलती फ़सल


दौर कैसा आ गया है, देखिए !

दोस्तों में अब नहीं होती चुहल


शिव कहां ! अब पूछती व्याकुल धरा

जो स्वयं ही कण्ठ में धारे गरल


बूंद "वर्षा" की, सभी की प्यास को 

तृप्ति देती है सदा निर्मल तरल


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)

बुधवार, फ़रवरी 24, 2021

किस तरह | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है


Dr. Varsha Singh

किस तरह


          - डॉ. वर्षा सिंह


याद उसको उसी रास्ते की कथा

जिसमें मिलती रही है व्यथा ही व्यथा 


तेज़ रफ़्तार थी ज़िन्दगी की बहुत 

काम तो थे कई किंतु अवसर न था 


जब से अस्मत लुटी एक मासूम की

देवता पर न उसकी रही आस्था


किस तरह वो तरक्क़ी करेंगे भला

जिनके पैरों में जकड़ी पुरानी प्रथा


बेवज़ह ज़िद पे अड़ने का जिनको शग़ल

बात करना भी उनसे यकीनन वृथा


सीढ़ियां आहटों से लिपटती रहीं

जो रुके ही नहीं उनमें वह एक था 


रात को नम हवा पास बैठी रही 

मेरे मन का समुंदर उसी ने मथा


जिसकी सूरत हृदय में समायी हुई

पूरी दुनिया से वो है अलग सर्वथा


बात मेरी समझ में न ये आ सकी 

प्यार को लोग लेते हैं क्यों अन्यथा !


बन के "वर्षा" झरीं, कुछ सिमट कर थमीं 

चंद बूंदों की स्थिति यथा की यथा


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)


शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2021

और कब तक | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh


और कब तक ...


          - डॉ. वर्षा सिंह


आग से भी खेलना है, राख होने का भी डर 

इस तरह पूरा न होगा, ज़िन्दगी का ये सफ़र 


तोड़ दो वह क़ैद जिसने धूप को बंदी किया

दस्तकें देते रहोगे और कब तक द्वार पर !


फूल नीले, पत्तियां काली, हवा कैसी चली !

कौन जाने लग गई इस बाग़ को किसकी नज़र


टेकना मस्तक नहीं, प्रतिकूलता के सामने 

रोशनी के वास्ते यह दीप-झंझा का समर


हो गए निष्प्राण रिश्ते, गुम हुआ अपनत्व भी

कोबरा से भी विषैला, स्वार्थपरता का ज़हर


खाईयां इतनी खुदी हैं दो दिलों के बीच में

अब नहीं आता मुझे पहचान में मेरा शहर


पड़ सके जिस पर न छाया, रंच भर अवसाद की

ढूंढ कर लायें चलो, कोई नई ताज़ा बहर 


समतलों को, घाटियों को ईर्ष्या होती रहे 

पर्वतों से प्यार "वर्षा" को रहेगा उम्र भर 



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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)

गुरुवार, फ़रवरी 18, 2021

हादसों की ख़बर | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

हादसों की खबर

    

          - डॉ. वर्षा सिंह


रात भर नींद क्यों टूटती रह गई 

मैं हवा से वज़ह पूछती रह गई 


इत्तेफ़ाक़न हुआ या कि साज़िश हुई 

ख़ुद नदी धार में डूबती रह गई 


इस तरफ है अंधेरा, उधर घोर तम

रोशनी बीच में झूलती रह गई


हादसों की खबर रोज़ अख़बार में 

देखकर, हर सुबह बूझती रह गई 


घर से निकला था, स्कूल पहुंचा नहीं

एक  बेटे  को  मां  ढूंढती रह गई


एक लम्हा खुशी का न ठहरा यहां 

देहरी आहटें चूमती रह गई 


प्यास को झील की थी ज़रूरत मगर

बांसवन में फंसी घूमती रह गई 


एक बादल न "वर्षा" का अपना हुआ

ज़िन्दगी आग से जूझती रह गई 


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)

सोमवार, फ़रवरी 15, 2021

फूल भर वसंत | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | ग़ज़लसंग्रह - दिल बंजारा


Dr. Varsha Singh

फूल भर वसंत


- डॉ. वर्षा सिंह


फूल भर वसंत, देह फागुनी हुई।

पंखुराई प्यास, आस दरपनी हुई।


सिर्फ़ एक नाम बार-बार होंठ पर

सिर्फ़ एक चाह बढ़ी, सौ गुनी हुई।


धूप-धूप सूरज, दिन सुनहरे हुए

यादों का चांद, रात चांदनी हुई।


आंचल का ठौर-खौर छू गई हवा

सांसों में ओर-छोर सनसनी हुई।


जंगल के अंग-अंग, छंद गंध के

पोखर का हार, नदी करधनी हुई।


मन में खजुराहो, तन ताज हो गया

आंखों में सपनों की  पाहुनी हुई।


आग फाग की पलाश में दहक उठी

गली-गली शहदीली गुनगुनी हुई।


प्रीत पगे मिसरे, रसधार प्यार की

‘वर्षा’ न बूंद, ग़ज़ल सावनी हुई।


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "दिल बंजारा" से)

शनिवार, फ़रवरी 13, 2021

एक सदी है भीतर | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

एक सदी है भीतर 


- डॉ. वर्षा सिंह


एक नदी बाहर बहती है, एक नदी है भीतर

बाहर दुनिया पल दो पल की, एक सदी है भीतर 


साथ गया कब कौन किसी के, रिश्तों की माया है 

बाहर आंखें पानी-पानी, आग दबी है भीतर 


मुट्ठी भर सपनों की ख़ातिर, जाने क्या-क्या झेला

बाहर हर दिन मेला लगता, पीर बसी है भीतर 


अपनी-अपनी मंज़िल सबकी, अपनी-अपनी दुनिया 

बाहर लंबी-चौड़ी राहें, बंद गली है भीतर 


रोज़ बदलता मौसम "वर्षा", सावन- फागुन लाए

बाहर हरी-भरी फुलवारी, फांस लगी है भीतर 


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)

शुक्रवार, फ़रवरी 12, 2021

इस शहर में | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh


इस शहर में


- डॉ. वर्षा सिंह


इक ख़बर अख़बार में छपने-छपाने चल पड़ी 

बात उसकी, कौन जाने किस बहाने चल पड़ी 


इस शहर में नींद का फेरा कभी होता नहीं 

रात सपनों के लिए मातम मनाने चल पड़ी 


एक लड़की सिसकियों का बोझ कांधे पर लिए 

उम्र का पूरा सफ़र तन्हा बिताने चल पड़ी


लोग चर्चा कर रहे थे देश के हालात पर 

और मां बच्चे के ख़ातिर दूध लाने चल पड़ी 


ख़ून में डूबी हुई वादी अकेली रह गई 

ज़िन्दगी फिर मौत के लम्हे उठाने चल पड़ी 


धूप, "वर्षा"-बादलों की भीड़ में खो कर कहीं 

नाम गुमनामों की सूची में बढ़ाने चल पड़ी


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)