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| Dr. Varsha Singh |
इस शहर में
- डॉ. वर्षा सिंह
इक ख़बर अख़बार में छपने-छपाने चल पड़ी
बात उसकी, कौन जाने किस बहाने चल पड़ी
इस शहर में नींद का फेरा कभी होता नहीं
रात सपनों के लिए मातम मनाने चल पड़ी
एक लड़की सिसकियों का बोझ कांधे पर लिए
उम्र का पूरा सफ़र तन्हा बिताने चल पड़ी
लोग चर्चा कर रहे थे देश के हालात पर
और मां बच्चे के ख़ातिर दूध लाने चल पड़ी
ख़ून में डूबी हुई वादी अकेली रह गई
ज़िन्दगी फिर मौत के लम्हे उठाने चल पड़ी
धूप, "वर्षा"-बादलों की भीड़ में खो कर कहीं
नाम गुमनामों की सूची में बढ़ाने चल पड़ी
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
