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गुरुवार, जनवरी 07, 2021

उदासियों से दोस्ती | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh


उदासियों से दोस्ती

            -डॉ. वर्षा सिंह


जहां पे आज रेत है, वहीं पे थी नदी कभी 

जले थे घाट पर दिए, हुई थी रोशनी कभी 


पता जहां का था लिखा, ख़यालों की किताब में

वो शाम आज तक वहां मुझे नहीं मिली कभी


कहानियों में है सुना कि आंधियों में टूट कर 

गिरे हैं फूल जिस जगह, वहीं थी ज़िन्दगी कभी


हवाएं बदहवास सी, हंसी के चिन्ह ढूंढती 

दुखों की छांव है वहां, बसी जहां खुशी कभी 


उदासियों से दोस्ती, न चाहते भी हो गई 

न राह पहले एक थी, न एक थी गली कभी 


यहां न "वर्षा", बिजलियां, झुलस रही है चांदनी

हां हैं चुप्पियां जहां, बजी थी बांसुरी कभी



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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)