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| Dr. Varsha Singh |
कुछ जतन कीजिए
- डॉ. वर्षा सिंह
पीपलों, बरगदों, आंवलों के लिए
हम दुआएं करें जंगलों के लिए
आग यूं ही धधकती रही हर तरफ
ठौर होगा कहां बुलबुलों के लिए
द्वार पर पांव रखने गई लड़कियां
चुप रहें, शर्त थी पायलों के लिए
काग़ज़ी आंकड़ों से भरी है सदी
जोड़-बाकी महज हलचलों के लिए
आज का दौर कल से ज़ुदा किस तरह
आज भी रोशनी कुछ पलों के लिए
आंख में जंग खाए सपन चुप रहे
आंसुओं की तपन काजलों के लिए
घुल रहा है हवा में ज़हर ही ज़हर
कुछ जतन कीजिए कोंपलों के लिए
साथ "वर्षा" निभाती रहेगी सदा
आस्था शेष है बादलों के लिए
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
