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| Dr. Varsha Singh |
फाग गाता है "ईसुरी" जंगल
- डॉ. वर्षा सिंह
है दरख़्तों की शायरी जंगल
धूप - छाया की डायरी जंगल
बस्तियों से निकल के तो देखो
ज़िन्दगी की है ताज़गी जंगल
गूंजती हैं ये वादियां जिससे
पर्वतों की है बांसुरी जंगल
कर रहा है अनेक कल्पों से
सृष्टिकर्ता की आरती जंगल
जीव हो या कि पौध हो कोई
हंस के करता है दोस्ती जंगल
याद करता है गर्व से अक्सर
''राम-सीता'' की जीवनी जंगल
जब बहारें "रजऊ"-सी सजती हैं
फाग गाता है *"ईसुरी" जंगल
दिल से पूछो ज़रा परिंदों के
खुद फ़रिश्ता है, ख़ुद परी जंगल
नाम ‘वर्षा’ बदल भी जाए तो
यूं न बदलेगा ये कभी जंगल
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* [ भारतेन्दु युग के लोककवि ईसुरी (1831-1909 ई.) आज भी बुंदेलखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हैं। ईसुरी की रचनाओं में ग्राम्य संस्कृति एवं सौंदर्य का वास्तविक चित्रण मिलता है। ग्राम्य संस्कृति का पूरा इतिहास केवल ईसुरी की फागों में मिलता है। उनकी फागों में प्रेम, श्रृंगार, करुणा, सहानुभूति, हृदय की कसक एवं मार्मिक अनुभूतियों का सजीव चित्रण है। उनकी ख्याति फाग के रूप में लिखी गई उन रचनाओं के लिए विशेष रूप से है, जो काल्पनिक प्रेमिका रजऊ को संबोधित करके लिखी गई हैं। ]
