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| Dr. Varsha Singh |
ग़ज़ल
औरत
- डॉ. वर्षा सिंह
ख़ूबसूरत सा ख़्वाब है औरत
ज़ुल्मतों का जवाब है औरत
इसको पढ़ना ज़रा आहिस्ता से
प्यार की इक किताब है औरत
इस जहां के हज़ार कांटों में
इक महकता गुलाब है औरत
इसमें दुर्गा, इसी में मीरा भी
आधी दुनिया की आब है औरत
जोड़, बाकी, बटा, गुणा "वर्षा"
ज़िन्दगी का हिसाब है औरत
