![]() |
| Dr. Varsha Singh |
यही कोशिश हो
- डॉ. वर्षा सिंह
रंग मेंहदी न बदल पाए, यही कोशिश हो
दहशतों से न दहल पाए, यही कोशिश हो
मन के आंगन में अंधेरों की जमी है काई
धूप आ कर न फिसल पाए, यही कोशिश हो
बीज की देह में पलती है हंसी जंगल की
फूल कोई न मसल पाए, यही कोशिश हो
उम्र गुज़री है हवाओं के तंज़ सहते हुए
ज़िन्दगी यूं न निकल पाए, यही कोशिश हो
राख होने से बचाना है अगर दुनिया को
आग कोई न उगल पाए, यही कोशिश हो
कौन कहता है कि धरती न रहेगी "वर्षा"
कोई मौसम न निगल पाए, यही कोशिश हो
----------
(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
