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गुरुवार, फ़रवरी 11, 2021

यही कोशिश हो | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh


यही कोशिश हो 


    - डॉ. वर्षा सिंह


रंग मेंहदी न बदल पाए, यही कोशिश हो 

दहशतों से न दहल पाए, यही कोशिश हो 


मन के आंगन में अंधेरों की जमी है काई 

धूप आ कर न फिसल पाए, यही कोशिश हो 


बीज की देह में पलती है हंसी जंगल की 

फूल कोई न मसल पाए, यही कोशिश हो 


उम्र गुज़री है हवाओं के तंज़ सहते हुए 

ज़िन्दगी यूं न निकल पाए, यही कोशिश हो 


राख होने से बचाना है अगर दुनिया को 

आग कोई न उगल पाए, यही कोशिश हो 


कौन कहता है कि धरती न रहेगी "वर्षा"

कोई मौसम न निगल पाए, यही कोशिश हो 


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)