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सोमवार, नवंबर 19, 2018

ग़ज़ल .... लड़ रहा अपनी हदों से आदमी - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

लड़ रहा अपनी हदों से हो गया है अधमरा
आदमी अंधी गली में ढूंढता है आसरा


आजकल खामोश ‘मोचीराम’ ‘धूमिल’ का हुआ
बोलता था तांत की तनकार में हरदम खरा


इक अजब सी तिक्तता घुलने लगी है स्वाद में
जीभ तालू से चिपकती होंठ जाते थरथरा


‘सहजपुर’ देहात से ‘सागर’ शहर ना आ सका
‘रामधन’ के सामने है भार कर्ज़े का धरा


एक ढिबरी रोशनी ही ग्लोब है जिसके लिए
वह सियासत का समझ पाता नहीं है माज़रा


तोड़कर नाता बिवाई से ग़ज़ल का इन दिनों
लिख रही है ज़िन्दगी दीवान भटकावों भरा


‘बेतवा’ में बाढ़ लेकिन ‘ओरछा’ सूखा पड़ा
विवश ‘वर्षा’,क्या करें मौसम बदलता पैंतरा