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| Dr. Varsha Singh |
लड़ रहा अपनी हदों से हो गया है अधमरा
आदमी अंधी गली में ढूंढता है आसरा
आजकल खामोश ‘मोचीराम’ ‘धूमिल’ का हुआ
बोलता था तांत की तनकार में हरदम खरा
इक अजब सी तिक्तता घुलने लगी है स्वाद में
जीभ तालू से चिपकती होंठ जाते थरथरा
‘सहजपुर’ देहात से ‘सागर’ शहर ना आ सका
‘रामधन’ के सामने है भार कर्ज़े का धरा
एक ढिबरी रोशनी ही ग्लोब है जिसके लिए
वह सियासत का समझ पाता नहीं है माज़रा
तोड़कर नाता बिवाई से ग़ज़ल का इन दिनों
लिख रही है ज़िन्दगी दीवान भटकावों भरा
‘बेतवा’ में बाढ़ लेकिन ‘ओरछा’ सूखा पड़ा

