ग़ज़ल पत्रिका By Dr Varsha Singh
जाने कितना लिख्खा मैंने जाने कितना बांचा मैंने आड़ी तिरछी इस दुनिया में ढूंढा अपना खांचा मैंने
दागरहित जो दिखा हमेशा वही फरेबी निकला अक्सर बदनामी जिसके सिर चिपकी उसको पाया सांचा मैंने
🌺 - डॉ. वर्षा सिंह