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| Dr. Varsha Singh |
सोचते थे हम सुरक्षित जिन सरोकारों के दर
छत दीवारों से अटी थी दीमकें थीं भीत पर
फ़ैसले में जब मिला संवेदनाओं को जहर
चुप रहे सब पेन की टूटी हुई निब देख कर
और लोगों की तरह वह हंस नहीं पाती कभी
एक लड़की टूटती, जुड़ती, सिसकती रात भर
न्यूनतम दर पर बिकी है आदमी की ज़िन्दगी सुर्खियों में छप न पाई इस दलाली की ख़बर
औरतें धो कर थकी बच्चों के गंदे पोतड़े
चौक पर चर्चा प्रगति की, कर रहा सारा शहर
फूट कर रिसती हताशा, मन दवाएं ढूंढता
तय बमुश्किल हो रहा है शोकगीतों का सफ़र
तोड़कर दर्पण न खुद से भाग पायेंगें कभी
था हमें मालूम “वर्षा”, भूल बैठे थे मगर
- डॉ. वर्षा सिंह

