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सोमवार, नवंबर 12, 2018

ग़ज़ल - सोचते थे हम.... डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh


सोचते थे हम सुरक्षित जिन सरोकारों के दर
छत दीवारों से अटी थी दीमकें थीं भीत पर  

फ़ैसले में जब मिला संवेदनाओं को जहर
चुप रहे सब पेन की टूटी हुई निब देख कर

और लोगों की तरह वह हंस नहीं पाती कभी
एक लड़की टूटती, जुड़ती, सिसकती रात भर

न्यूनतम दर पर बिकी है आदमी की ज़िन्दगी सुर्खियों में छप न पाई इस दलाली की ख़बर

औरतें  धो कर थकी बच्चों के गंदे पोतड़े
चौक पर चर्चा प्रगति की, कर रहा सारा शहर

फूट कर रिसती हताशा, मन दवाएं ढूंढता  
तय बमुश्किल हो रहा है शोकगीतों का सफ़र

तोड़कर दर्पण न खुद से भाग पायेंगें कभी
था हमें मालूम “वर्षा”, भूल बैठे थे मगर
                                         - डॉ. वर्षा सिंह