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शुक्रवार, सितंबर 11, 2020

शायरी में हिन्दी | हिन्दी दिवस 14 सितम्बर | डॉ. वर्षा सिंह

हिन्दी दिवस (14 सितम्बर ) की हार्दिक शुभकामनाएं !!!!
    यह सर्वविदित है कि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। हिंदी के महत्व को बताने और इसके प्रचार प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है।
   हिन्दी में ग़ज़ल कहने, लिखने की एक लम्बी परम्परा है। तो आज मैं बात करना चाहती हूं उन हिन्दी-उर्दू  ग़ज़लों, उन शेरों की, जिनमें हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम की भावना स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। यहां प्रस्तुत हैं ऐसी ही कुछ ग़ज़लें, कुछ शेर....

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है,
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूं हिन्दी मुस्कुराती है।

उछलते खेलते बचपन में बेटा ढूंढती होगी,
तभी तो देख कर पोते को दादी मुस्कुराती है,

तभी जा कर कहीं माँ-बाप को कुछ चैन पड़ता है,
कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है

चमन में सुबह का मंज़र बड़ा दिलचस्प होता है,
कली जब सो के उठती है, तो तितली मुस्कुराती है

हमें ऐ ज़िन्दगी तुझ पर हमेशा रश्क आता है,
मसाइल से घिरी रहती है, फिर भी मुस्कुराती है

- मुनव्वर राणा  
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यूँ तो समन्दरों से मेरी आशनाई है
प मेरी प्यास में भी अजब पारसाई है

राहत की बात ये है के बेदाग़ हाथ हैं
उरयानियत की हमने हिना कब लगायी है

छोटी को निगल जाएँ बड़ी मछलियां प मैं
ज़िंदा हूँ इनके दरमियाँ,क्या कम ख़ुदाई है ?

जा मैंने इस्तफादा किया अश्क से तो क्या
तुझको नमी क्या आँख की मैंने दिखाई है ?

इससे बड़ा मज़ाक़ तो होगा भी क्या भला
हिन्दू हैं,मुल्क हिंद है,हिंदी परायी है !

हमको तमाशबीन जो कहते हैं,हैफ़ है
और वो ? दुकान जिसने सदन में लगायी है

ये सोच कर के बात बिगड़ जाये ना कहीं
मैंने लबे-"हया" पे खमोशी सजाई है

प = पर
आशनाई= जान पहचान
पारसाई = सब्र ,संयम
इस्तफादा= फायदा उठाना
उर्यानियत =नग्नता
खमोशी= ख़ामोशी

- लता 'हया'
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दो- तिहाई विश्व की ललकार है हिंदी मेरी 
माँ की लोरी व पिता का प्यार है हिंदी मेरी ।

बाँधने को बाँध लेते लोग दरिया अन्य से 
पर भंवर का वेग वो विस्तार है हिंदी मेरी ।

सुर -तुलसी और मीरा के सगुन में रची हुई 
कविरा और बिहारी की फुंकार है हिंदी मेरी ।

फ्रेंच , इंग्लीश और जर्मन है भले परवान पर 
आमजन की नाव है, पतवार है हिंदी मेरी ।

चांद भी है , चांदनी भी , गोधुली- प्रभात भी ओ
हरतरफ बहती हुई जलधार है हिंदी मेरी ।

- रवीन्द्र प्रभात

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एक
अनगिन खूबी है हिंदी की, जितनी कहो गिनाते जाएं।
हिंदी की  उन्नति  से  जागे, सब की उन्नति की आशाएं ।

भिन्न-भिन्न भाषा के अक्षर, इसमें  एकाकार  हो   गए, 
यही  एकता  सूत्र  बनी है, यही  मिटाती  हर  बाधाएं ।

दो

सोचती हूं कि हिन्दी कहां खो रही
बढ़ रहा आंग्ल का ही है खाता-बही

एक पर  एक  ग्यारह   नहीं है पता
आज बच्चे  ‘इलेवन’ को  जानें सही

‘इंडिया’ जो कहें  आधुनिक-सा लगे
नाम ‘भारत’ तो मानो पुरातन वही

चाह मन की  ये  सबसे कहूं  आज मैं
काश! दुनिया की भाषा हो हिन्दी कभी 

- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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भारत की पहचान है हिंदी
जन जन का सम्मान है हिंदी

लेकिन क्यूँ लगती बेघर ये
झेल रही अपमान है हिंदी।

अपनेपन की शीतल सरिता
प्यारी एक जुबान है हिंदी।।

दुनिया में लहराती परचम
भाषा एक महान है हिंदी।।

बहती उत्तर से दक्षिण तक
एका की पहचान है हिंदी।।

मान दिलाये दूर देश में
गीता है कुरान है हिंदी।।

रहती है बंधकर नियम में
भाषा में विज्ञान है हिंदी।।

जोश जगाती रणवीरों में
तिरंगे का मान है हिंदी।।

वीरों की गाती गाथा है
इस मिट्टी की जान है हिंदी।।

 - सुरेन्द्र नाथ सिंह ‘कुशक्षत्रप’
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कितनी प्यारी ये मनभावन हिन्दी है
भारत की वैचारिक धड़कन हिन्दी है

जो लिखता हूँ हिन्दी में ही लिखता हूँ
मेरी ख़ुशियों का घर आँगन हिन्दी है

रफ़ी, लता,मन्नाडे को तुम सुन लेना
इन सबकी भाषा और गायन हिन्दी है

भारत में कितनी हैं भाषाएँ लेकिन
सारी भाषाओँ का यौवन हिन्दी है

पहले मैं अक्सर उर्दू में लिखता था
अब तो मेरा सारा लेखन हिन्दी है

मुझको तो लगती है ये भाषा अपनी
लेकिन कुछ लोगों की उलझन हिन्दी है

गर्व करे हर भारतवासी ये बोले
मेरे देश की भाषा पावन हिन्दी है

औरों की तो बात "समर" मैं क्या बोलूँ
मेरे माथे का तो चंदन हिन्दी है

- समर कबीर

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सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलिसतां हमारा

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा 

यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गए जहां से
अब तक मगर है बाकी नामों निशां हमारा 

कुछ बात है कि हस्ती मिटती मिटाये
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा 

‘इक़बाल’ कोई महरम अपना नहीं जहां में
मालूम क्या किसी को दर्दे निहां हमारा 

- अल्लामा इक़बाल

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संस्कारों की ये पिटारी है,
अपनी वाणी ही लाभकारी है ।

फूल अभिधा के लक्षणा लेकर,
व्यंजनाओं की ये तो क्यारी है ।

अपनी भाषा में बोलना सुनना,
भूलना भूल एक भारी है ।

ठेठ हिंदी का ठाठ तो देखो,
मन में रसखान के मुरारी है ।

कितनी भाषाएँ  हैं मनोरम पर,
सब में हिंदी बड़ी ही प्यारी है ।

अपने घर में दशा पराई सी,
देख कर मन बहुत ही भारी है ।

इंडिया अब कहो न भारत को,
'आरज़ू' अब यही हमारी है ।

- अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'
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इन्ग्लिश से छिडी ज‍ग तो हिन्दी मे बोलिए
हिन्दी की है तरन्ग तो हिन्दी मे बोलिए
हिन्दी दिवस पे नेता ने हिन्दी मे ये कहा
हिन्दी है मदर टन्ग तो हिन्दी मे बोलिए

- वीनू महेन्द्र
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स्वार्थ में डूबे हुए हैं हाशिए
जर्जरित रिश्ते कोई कैसे सिए

मैं नदी बन भी गई तो क्या हुआ
कौन जो सागर बने मेरे लिए 

पर्वतों के पास तक पहुंचे नहीं
घाटियों ने खूब दुखड़े रो लिए

किस क़दर अंग्रेजियत हावी हुई
आप हिन्दी की व्यथा मत पूछिए 

सर्पपालन का अगर है शौक तो
आस्तीनों में न अपने पालिए

आजकल "वर्षा" रदीफ़ों की जगह
अतिक्रमित करने लगे हैं काफ़िए

 - डॉ. वर्षा सिंह

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सोमवार, दिसंबर 03, 2018

उर्दू- हिन्दी शायरी में चांद और चांदनी - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
उर्दू- हिन्दी शायरी में चांद और चांदनी पर बहुत कुछ कहा - लिखा गया है। आज शायरी चांद और चांदनी की चर्चा कर रही हूं। ये कुछ ऐसे अशआर, कुछ ऐसी ग़ज़लों का ज़िक्र कर रही हूं मैं, जो मुझे अच्छे लगते हैं…. यकीनन आपको भी पसंद आयेंगे।

बेसबब मुस्कुरा रहा है चाँद
कोई साज़िश छुपा रहा है चाँद


छू के देखा तो गर्म था माथा
धूप में खेलता रहा है चाँद

सूखी जामुन के पेड़ के रस्ते
छत ही छत पर जा रहा है चाँद
- गुलज़ार

चाँद भी हैरान दरिया भी परेशानी में है
अक्स किस का है कि इतनी रौशनी पानी में है
- फ़रहत एहसास

हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका
सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा
- बशीर बद्र


ये तो देखने पर है ये तो सोचने पर है
चाँद आरज़ू भी है चांदनी कफ़न भी है
- राही मासूम रज़ा


Painting by Dr. (Miss) Sharad Singh

ये कसक दिल की दिल में चुभी रह गयी
ज़िन्दगी में तुम्हारी कमी रह गयी

एक मैं, एक तुम, एक दीवार थी
ज़िन्दगी आधी आधी बंटी रह गयी

मैंने रोका नहीं वो चला भी गया
बेबसी दूर तक देखती रह गयी

मेरे घर की तरफ धूप की पीठ थी
आते आते इधर चांदनी रह गयी
-बशीर बद्र

दिल में ऐसे उतर गया कोई
जैसे अपने ही घर गया कोई

इतने खाए थे रात से धोखे
चाँद निकला कि डर गया कोई

इश़्क भी क्या अजीब दरिया है
मैं जो डूबा, उभर गया कोई
- सूर्यभानु गुप्त

कल चौदवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा
- इब्ने इंशा

Painting by Dr. (Miss) Sharad Singh
चांदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी
– दुष्यंत कुमार


मन में सपने अगर नहीं होते,
हम कभी चाँद पर नहीं होते।

सिर्फ जंगल में ढूँढ़ते क्यों हो?
भेड़िए अब किधर नहीं होते।

जिनके ऊँचे मकान होते हैं,
दर-असल उनके घर नहीं होते।

प्यार का व्याकरण लिखें कैसे,
भाव होते हैं स्वर नहीं होते।
- उदयभानु 'हंस'

दूर के चांद को ढूंढो न किसी आँचल में
ये उजाला नहीं आँगन में समाने वाला
- निदा फ़ाज़ली


तुम भी लिखना तुम ने उस शब कितनी बार पिया पानी
तुम ने भी तो छज्जे ऊपर देखा होगा पूरा चाँद
- निदा फ़ाज़ली


Painting by Dr. (Miss) Sharad Singh


जिंदगी की हर मंजिल मुकद्दर की कैद में
आज भी है मेरा साहिल समंदर की कैद में

रोते हुए बादल को है सदियों से ये खबर
जलती हुई चांदनी है एक पत्थर की कैद मेंं
- राजीव सिंह


रात हुई है चाँद जमीं पर हौले-हौले उतरा है,
तुम भी आ जाते तो सारा नूर मुकम्मल हो जाता
- कुमार विश्वास

उसी तरह से हर इक ज़ख़्म खुशनुमा देखे
वो आये तो मुझे अब भी हरा-भरा देखे

गुज़र गए हैं बहुत दिन रिफ़ाक़ते-शब में
इक उम्र हो गई चेहरा वो चाँद-सा देखे
- परवीन शाकिर

Painting by Dr. (Miss) Sharad Singh

रात को रोज़ डूब जाता है
चाँद को तैरना सिखाना है
- बेदिल हैदरी

वो चाँद कह के गया था कि आज निकलेगा
तो इंतज़ार में बैठा हुआ हूँ शाम से मैं
- फ़रहत एहसास

माथे पे तेरे चमके है झूमर का पड़ा चाँद
ला बोसा चढ़े चाँद का वादा था चढ़ा चाँद
- ज़ौक

रात के नाम  एक ख़त लिखना
चांद है फिर उदास मत लिखना
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

नींद आए तो ख़्वाब  आएंगे
होंठ  कुछ लम्हा मुस्कुराएंगे
चांद का नूर याद कर कर के
रात   की आयतें   सुनाएंगे
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह


Painting by Dr. (Miss) Sharad Singh


बेचैनी की गठरी में बंध, रातें लगतीं बुझी-बुझी सी
आसमान पर चांद अकेला देर रात मुझ पर रोता है
अपनी तनहाई के ख़त को रोज खोलना, रोज बांचना
हर कोई अपने *माज़ी को आखिर क्यों इतना ढोता है ?
(*माज़ी=अतीत)                            
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा,
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा

बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआँ तन्हा

ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा

हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,
दोनों चलते रहें कहाँ तन्हा

जलती-बुझती-सी रोशनी के परे,
सिमटा-सिमटा-सा एक मकाँ तन्हा

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे ये जहाँ तन्हा
- मीना कुमारी


Painting by Dr. (Miss) Sharad Singh


चाँद तारों की गुफ्तगू सुनता रहा रात भर
जलन से बादल रंग बदलता रहा रात भर

मखमल के बिस्तर से सड़क के फुटपाथ तक
ख़ाबों का सौदा होता रहा रात  भर
- पंकज शादाब

आलम   ही ऐसा  बना कि बर्बाद  हो गये ,
बर्बादी  ने लगायें  चार चाँद , मशहूर  हो गये।
- अनिता सैनी

उमर की पटरियों पर जिंदगी की रेल है
ये मरना और जीना तो समय का खेल है

तिरा मासूम चे‍हरा जुल्‍फ काली और घनी
के जैसे चांद का संग बादलों के खेल है
  - दिगम्बर नासवा

Painting by Dr. (Miss) Sharad Singh

जख्‍म पर मरहम लगाने क्‍यों नहीं आते
गीत कोई गुनगुनाने क्‍यों नहीं आते

आसमां से चांद तारे छीन लाऊंगा
हौसला मेरा बढ़ाने क्‍यों नहीं आते

बंद है मुट्ठी में मेरी सावनी बादल
है जो हिम्‍मत घर जलाने क्‍यों नहीं आते

रात भीगी सी है और महका हुआ दिन है
ख्‍वाब आंखों में सजाने क्‍यों नहीं आते
- दिगम्बर नासवा


तीरगी चाँद को ईनाम-ए-वफ़ा देती है,
रात-भर डूबते सूरज को सदा देती है
- शमीम हनफ़ी


कभी चाँद चमका ग़लत वक़्त पर
कभी घर में सूरज उगा देर से
-निदा फ़ाजली


मैंने देखा, मैं जिधर चला,
मेरे सँग सँग चल दिया चाँद
पीले गुलाब-सा लगता था
हल्के रंग का हल्दिया चाँद
- पण्डित नरेन्द्र शर्मा

Painting by Dr. (Miss) Sharad Singh

गज़ल को ले चलो अब गांव के दिलकश नज़ारों में।
मुसलसल फ़न का दम घुटता है इऩ अदबी इदारों में।
अदीबो, ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुल्लमे के सिवा क्या है फ़लक के चांद-तारों में
- अदम गोंडवी

चाँद है ज़ेरे-क़दम. सूरज खिलौना हो गया
हाँ, मगर इस दौर में क़िरदार बौना हो गया
शहर के दंगों में जब भी मुफलिसों के घर जले
कोठियों की लॉन का मंज़र सलोना हो गया
- अदम गोंडवी

....... और अंत में मेरी यानी डॉ. वर्षा सिंह की शायरी में शामिल चांद और चांदनी 😊❤😊

तुम रात के सिरहाने इक चांद तो रख जाते
नींदों  में उदासी  के सपने तो  नहीं आते
- डॉ वर्षा सिंह

रात के माथे टीका चांद
खीर सरीखा मीठा चांद

हंसी चांदनी धरती पर
आसमान में चहका चांद

महकी बगिया यादों की
लगता महका महका चांद

उजली चिट्ठी  चांदी- सी
नाम प्यार के लिखता चांद

"वर्षा" मांगे दुआ यही
मिले सभी को अपना चांद
- डॉ. वर्षा सिंह

Painting by Dr. (Miss) Sharad Singh

बज रही बांसुरी
सज रही ज़िन्दगी
चांद की आहटें
सुन रही चांदनी
मन में कान्हा बसे
रोशनी -  रोशनी
इश्क़ गढ़ने लगा
हर तरफ आशिक़ी
नेह - "वर्षा" हुई
भीगती शायरी
          - डॉ वर्षा सिंह


धरती पर पानी लिख देना
आंचल को धानी लिख देना

चाहत पर बंधन का पहरा
कुछ तो मनमानी लिख देना

बेशक लिखना अमर प्यार को
दुनिया को फानी लिख देना

इंतज़ार में चांद - रात के
दिन की कुर्बानी लिख देना

मौसम को यदि राजा लिखना
"वर्षा" को रानी लिख देना

       ❤ डॉ. वर्षा सिंह


Painting by Dr. (Miss) Sharad Singh