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शुक्रवार, अप्रैल 16, 2021

है ज़रूरी सावधानी | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

ग़ज़ल
है ज़रूरी सावधानी

     - डॉ. वर्षा सिंह

बेबसी में ज़िन्दगानी
बोतलों में बंद पानी

नीर के स्त्रोतों से कब तक
और होगी छेड़खानी

कल धरा का रूप क्या हो !
दिख रहा जो आज धानी

गर नहीं दुनिया रही तो
कौन राजा, कौन रानी !

राजनीतिक द्यूत क्रीड़ा
दांव पर खेती -किसानी

वन कटे तो नित बदलती
मौसमों की राजधानी

लौट आया है कोरोना
है  ज़रूरी सावधानी

रात भर सोती नहीं मां
हो रही बेटी सयानी

क्या किया, सोचो कभी तो
गुम कुंआ, नदिया सुखानी

काटना होगा जो बोया
रीत यह तो है पुरानी

देश के जो काम आए
सार्थक है वो जवानी

क्या कहें, पूरब से पश्चिम
छा गई है बेईमानी

छांछ-मक्खन बांट देगी
वक़्त की चलती मथानी

बुझ रही संवेदना की
ज्योति होगी अब जगानी

रह न जाये याद बन कर
बूंद-"वर्षा" की कहानी

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