रविवार, मार्च 25, 2018

क्या किया, सोचो कभी तो

बेबसी में ज़िन्दगानी
बोतलों में बंद पानी
काटना होगा जो बोया
है यही चिंता पुरानी
नीर के स्त्रोतों से कब तक
और होगी छेड़खानी
कल धरा का रूप क्या हो !
दिख रही जो आज धानी
गर नहीं सत्ता रहेगी
कौन राजा, कौन रानी !
क्या किया, सोचो कभी तो
गुम कुंआ, नदिया सुखानी
काटना होगा जो बोया
रीत दुनिया की पुरानी
रह न जाये याद बन कर
बूंद-"वर्षा" की कहानी
- डॉ. वर्षा सिंह

शहीदों को नमन



चल दिये थे वो अकेले, काफ़िला देखा नहीं
देश को देखा था, अपना फ़ायदा देखा नहीं
बांध कर सिर पर कफ़न निकले थे जो बेख़ौफ़ हो
मंज़िलों पर थी नज़र फिर रास्ता देखा नहीं
देश को आज़ाद करने का ज़ुनूं दिल में लिए
हंस के बंदी बन गये थे, कठघरा देखा नहीं
उन शहीदों को नमन है, जो वतन पर मिट गये
ताज कांटों का पहन कर आईना देखा नहीं
राजगुरु, सुखदेव, "वर्षा", भगत सिंह, आज़ाद ने
आंधियों में आशियों का आसरा देखा नहीं
  -  डॉ. वर्षा सिंह

मंगलवार, फ़रवरी 13, 2018

फिर नयी इक शाम आई

फिर नयी इक शाम आई
साथ अपने  रात  लाई

एक मिसरा दोस्ती तो
एक मिसरा बेवफाई

कुछ यहां लिखना कठिन है
काग़जों पर रोशनाई

और कब तक बच सकेंगे
वक़्त की दे कर दुहाई

किस तरह स्वेटर बुनें हम
बीच से टूटी सलाई

क्या कहें " वर्षा" किसी को
ग़म हुए हैं एकजाई
   
     ❤ - डॉ. वर्षा सिंह

इसीलिये सूरज डूबा है, कल फिर नया सबेरा हो ।

इसीलिये सूरज डूबा है, कल फिर नया सबेरा हो ।
ख़्वाब अधूरा रहे न कोई, तेरा हो या मेरा हो ।

फूल खिले तो बिखरे ख़ुशबू, बिना किसी भी बंधन के,
रहे न दिल में कभी निराशा, उम्मीदों का डेरा हो ।

जहां -जहां भी जाये मनवा, अपनी चाहत को पाये,
इर्दगिर्द चौतरफा हरदम ख़ुशियों वाला घेरा हो ।

आंसू दूर रहें आंखों से, होंठों पर मुस्कान बसे,
दुख ना आये कभी किसी पर, सिर्फ़ सुखों का फेरा हो ।

कुण्ठा का तम घेर न पाये, मुक्त उजाला रहे सदा,
"वर्षा" रोशन रहे हर इक पल, कोसों दूर अंधेरा हो ।
     💕- डॉ. वर्षा सिंह

मंगलवार, जनवरी 09, 2018

Yes, It's me Dr Varsha Singh

Hello Everyone,
   I'm a poetess .... Shayar too.
I love poetry & photography too.

Under the guise of words
Hidden words many
Sings love and
New story

गहरा पानी है

गहरा पानी है

आज न जाने दिल ने मेरे, कैसी ठानी है !
नाव उतारी वहां, जहां पर गहरा पानी है

वक़्त नया है, सदी नयी है, फ़र्क नहीं पड़ता
आग का दरिया, डूब के जाना, रीत पुरानी है

हमें मांगना और छीनना,  नहीं गंवारा है
इस दुनिया से अपनी दुनिया हमें चुरानी है

जिसने भी अंगारे छूये, उसका हाथ जला
इसकी, उसकी, सबकी "वर्षा", एक कहानी है

   - डॉ. वर्षा सिंह

#Ghazal_DrVarshaSingh1
#Ghazal #VarshaSingh #Emotions