शुक्रवार, अप्रैल 06, 2018
गुरुवार, मार्च 29, 2018
सूखा फूल मिला हो जैसे..... डॉ. वर्षा सिंह
भूली बिसरी याद जाग कर हलचल करती है दिल में
सूखा फूल मिला हो जैसे किसी पुराने नाविल में
एक हंसी दे जाता है और एक ख़ुशी ले जाता है
फ़र्क यही होता है जीवनदाता में और क़ातिल में
होना क्या था और हुआ क्या, भेद न मन कर पाता है
अर्थ बदल जाते हैं अक़्सर सपनों वाली झिलमिल में
यूं तो सूची बहुत बड़ी है, "लाइक" करने वालों की
लेकिन दोस्त वही सच्चा है काम जो आये मुश्किल में
"वर्षा" नफरत के बदले में नफरत ही हासिल होती छिपी हुई रहती है दुनिया नन्हीं सी इस्माइल में
🌹- डॉ. वर्षा सिंह
बुधवार, मार्च 28, 2018
मन कहीं लगता नहीं
कह दिया मौसम ने सब कुछ, किन्तु वो समझा नहीं
क्या पता समझा भी हो तो, कुछ कभी कहता नहीं
क्या पता समझा भी हो तो, कुछ कभी कहता नहीं
ज़िंदगी में यूं भी पहले उलझनें कुछ कम न थीं
की जो सुलझाने की कोशिश, कुछ मगर सुलझा नहीं
की जो सुलझाने की कोशिश, कुछ मगर सुलझा नहीं
भीड़ में, एकांत में, गुलज़ार में, वीरान में
कौन जाने क्या हुआ है, मन कहीं लगता नहीं
कौन जाने क्या हुआ है, मन कहीं लगता नहीं
इस क़दर बदले हुए हैं, बंधनों के मायने
है खुला पिंजरा, परिंदा अब मगर उड़ता नहीं
है खुला पिंजरा, परिंदा अब मगर उड़ता नहीं
लाख कोशिश कीजिये, "वर्षा" यकीनन जानिये
लग कभी सकता किसी की, सोच पर पहरा नहीं
- डॉ. वर्षा सिंह
लग कभी सकता किसी की, सोच पर पहरा नहीं
- डॉ. वर्षा सिंह
रविवार, मार्च 25, 2018
क्या किया, सोचो कभी तो
बेबसी में ज़िन्दगानी
बोतलों में बंद पानी
बोतलों में बंद पानी
काटना होगा जो बोया
है यही चिंता पुरानी
है यही चिंता पुरानी
नीर के स्त्रोतों से कब तक
और होगी छेड़खानी
और होगी छेड़खानी
कल धरा का रूप क्या हो !
दिख रही जो आज धानी
दिख रही जो आज धानी
गर नहीं सत्ता रहेगी
कौन राजा, कौन रानी !
कौन राजा, कौन रानी !
क्या किया, सोचो कभी तो
गुम कुंआ, नदिया सुखानी
गुम कुंआ, नदिया सुखानी
काटना होगा जो बोया
रीत दुनिया की पुरानी
रीत दुनिया की पुरानी
रह न जाये याद बन कर
बूंद-"वर्षा" की कहानी
बूंद-"वर्षा" की कहानी
- डॉ. वर्षा सिंह
शहीदों को नमन
चल दिये थे वो अकेले, काफ़िला देखा नहीं
देश को देखा था, अपना फ़ायदा देखा नहीं
देश को देखा था, अपना फ़ायदा देखा नहीं
बांध कर सिर पर कफ़न निकले थे जो बेख़ौफ़ हो
मंज़िलों पर थी नज़र फिर रास्ता देखा नहीं
मंज़िलों पर थी नज़र फिर रास्ता देखा नहीं
देश को आज़ाद करने का ज़ुनूं दिल में लिए
हंस के बंदी बन गये थे, कठघरा देखा नहीं
हंस के बंदी बन गये थे, कठघरा देखा नहीं
उन शहीदों को नमन है, जो वतन पर मिट गये
ताज कांटों का पहन कर आईना देखा नहीं
ताज कांटों का पहन कर आईना देखा नहीं
राजगुरु, सुखदेव, "वर्षा", भगत सिंह, आज़ाद ने
आंधियों में आशियों का आसरा देखा नहीं
आंधियों में आशियों का आसरा देखा नहीं
- डॉ. वर्षा सिंह
मंगलवार, फ़रवरी 13, 2018
फिर नयी इक शाम आई
फिर नयी इक शाम आई
साथ अपने रात लाई
एक मिसरा दोस्ती तो
एक मिसरा बेवफाई
कुछ यहां लिखना कठिन है
काग़जों पर रोशनाई
और कब तक बच सकेंगे
वक़्त की दे कर दुहाई
किस तरह स्वेटर बुनें हम
बीच से टूटी सलाई
क्या कहें " वर्षा" किसी को
ग़म हुए हैं एकजाई
❤ - डॉ. वर्षा सिंह
इसीलिये सूरज डूबा है, कल फिर नया सबेरा हो ।
इसीलिये सूरज डूबा है, कल फिर नया सबेरा हो ।
ख़्वाब अधूरा रहे न कोई, तेरा हो या मेरा हो ।
फूल खिले तो बिखरे ख़ुशबू, बिना किसी भी बंधन के,
रहे न दिल में कभी निराशा, उम्मीदों का डेरा हो ।
जहां -जहां भी जाये मनवा, अपनी चाहत को पाये,
इर्दगिर्द चौतरफा हरदम ख़ुशियों वाला घेरा हो ।
आंसू दूर रहें आंखों से, होंठों पर मुस्कान बसे,
दुख ना आये कभी किसी पर, सिर्फ़ सुखों का फेरा हो ।
कुण्ठा का तम घेर न पाये, मुक्त उजाला रहे सदा,
"वर्षा" रोशन रहे हर इक पल, कोसों दूर अंधेरा हो ।
💕- डॉ. वर्षा सिंह
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