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| Dr. Varsha Singh |
- डॉ. वर्षा सिंह
सिसकती हुई-सी हंसी लग रही है
है मेरी, मुझे अजनबी लग रही है
शहर अपनी रौ में बहा जा रहा है
अंधेरों में गुम रोशनी लग रही है
हदें छू रही हैं किसी की उड़ानें
किसी से ज़मीं भी कटी लग रही है
सफ़ेदी पुती हर इबारत के पीछे
उदासी की स्याही छुपी लग रही है
बेशक कोई ख़ास ही बात होगी
तभी बदगुमां ज़िन्दगी लग रही है
कमी ढूंढने का शग़ल भी अजब है
उन्हें हादसों में कमी लग रही है
गुमे हैं वहां बाढ़ में पुल नदी के
यहां पर तो "वर्षा" थमी लग रही है
(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
