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शनिवार, जनवरी 23, 2021

उलझनों का दौर है | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

उलझनों का दौर है


           -डॉ. वर्षा सिंह


प्रचार, पक्षपात और अनबनों का दौर है 

फूल-फल रहा है झूठ, उलझनों का दौर है 


स्वांग और सत्य में न भेद कोई शेष है 

टूट कर झरी है चाह, किरचनों का दौर है 


सदी बदल गई मगर नदी तो रेत-रेत है 

क्या कभी बुझेगी प्यास, चिन्तनों का दौर है 


फटे तो बीज की तरह, हुए भी अंकुरित मगर 

हो सके हरे न ख़्वाब, दुश्मनों का दौर है 


सोच और सोच के सिवा न कुछ भी और है

जोर-शोर से है खोज, मन्थनों का दौर है 


मुक्ति भी यकीन है कभी मिलेगी शर्तिया 

आजकल भले है क़ैद, बन्धनों का दौर है 


न ठौर "वर्षा" पा सकी, न ठौर मेघ पा सके

वक़्त रच रहा है खेल, अड़चनों का दौर है


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)