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| Dr. Varsha Singh |
उलझनों का दौर है
-डॉ. वर्षा सिंह
प्रचार, पक्षपात और अनबनों का दौर है
फूल-फल रहा है झूठ, उलझनों का दौर है
स्वांग और सत्य में न भेद कोई शेष है
टूट कर झरी है चाह, किरचनों का दौर है
सदी बदल गई मगर नदी तो रेत-रेत है
क्या कभी बुझेगी प्यास, चिन्तनों का दौर है
फटे तो बीज की तरह, हुए भी अंकुरित मगर
हो सके हरे न ख़्वाब, दुश्मनों का दौर है
सोच और सोच के सिवा न कुछ भी और है
जोर-शोर से है खोज, मन्थनों का दौर है
मुक्ति भी यकीन है कभी मिलेगी शर्तिया
आजकल भले है क़ैद, बन्धनों का दौर है
न ठौर "वर्षा" पा सकी, न ठौर मेघ पा सके
वक़्त रच रहा है खेल, अड़चनों का दौर है
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
