एक सदी है भीतर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
एक सदी है भीतर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, फ़रवरी 13, 2021

एक सदी है भीतर | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

एक सदी है भीतर 


- डॉ. वर्षा सिंह


एक नदी बाहर बहती है, एक नदी है भीतर

बाहर दुनिया पल दो पल की, एक सदी है भीतर 


साथ गया कब कौन किसी के, रिश्तों की माया है 

बाहर आंखें पानी-पानी, आग दबी है भीतर 


मुट्ठी भर सपनों की ख़ातिर, जाने क्या-क्या झेला

बाहर हर दिन मेला लगता, पीर बसी है भीतर 


अपनी-अपनी मंज़िल सबकी, अपनी-अपनी दुनिया 

बाहर लंबी-चौड़ी राहें, बंद गली है भीतर 


रोज़ बदलता मौसम "वर्षा", सावन- फागुन लाए

बाहर हरी-भरी फुलवारी, फांस लगी है भीतर 


------------


(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)