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| Dr. Varsha Singh |
मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 10 जून 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=15661
कैसा ये इश्क़ है!
- डॉ. वर्षा सिंह
आंखें न पढ़ सके तुम, कैसा ये इश्क़ है!
बढ़ते क़दम गये थम, कैसा ये इश्क़ है!
इक आरजू थी दिल में, दिल में ही रह गई
पलकें मेरी हुईं नम, कैसा ये इश्क़ है!
आरोह से पहले ही अवरोह आ गया
पूरी हुई न सरगम, कैसा ये इश्क़ है!
तुम दूर जा रहे थे लब पर हंसी लिए
मैं आज भी हूं गुमसुम, कैसा ये इश्क़ है!
होने को हुई "वर्षा" , बूंदें नहीं गिरीं
आंसू गिरे झमाझम, कैसा ये इश्क़ है!
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#ग़ज़लवर्षा

