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| Dr. Varsha Singh |
चलते-चलते
- डॉ. वर्षा सिंह
रंज-ओ-ग़म से नहीं बचा कोई
दर्द-ए-दिल की नहीं दवा कोई
ज़िन्दगी की उदास राहों में
है नहीं अपना आश्ना कोई
बेवजह रूठ कर जो माने ना
ऐसे होता नहीं ख़फ़ा कोई
आपसे दिल्लगी का मक़सद था
आप देते हमें सज़ा कोई
जैसे माज़ी पुकारता हो मेरा
ऐसी मुझको न दे सदा कोई
अब के मौसम में क्या हुआ, या रब!
हो गया फूल फिर जुदा कोई
यूं ही आंखों में आ गए आंसू
अब न उमड़ेगी फिर घटा कोई
उनकी यादों को नींद आ जाए
काश! ऐसी करे दुआ कोई
यूं ही चुपके से मेरे सिरहाने
आ के रख जाए फिर वफ़ा कोई
बुझ रहे हैं च़िराग, बुझ जाएं
अब न दीजे इन्हें हवा कोई
आप तक जा के ख़त्म हो जाए
ऐसा मिल जाए रास्ता कोई
मंज़िल-ए-राहे-इश्क़ में "वर्षा"
चलते-चलते नहीं थका कोई
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "दिल बंजारा" से)
