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| Dr. Varsha Singh |
फोन पर उसकी आवाज़
-डॉ. वर्षा सिंह
खोल दो खिड़कियां कुछ उजाला मिले
धूप की धार से कुछ अंधेरा छिले
सारे संसार को बांधकर इक छुवन
देह की हर थकन एक पल में सिले
शब्द सुलगे हुए, अर्थ दहके हुए
सांस-दर-सांस इक आंच-सी फिर खिले
फोन पर उसकी आवाज़ की ताज़गी
फूल खिलने-महकने के ये सिलसिले
इस तरह से सहेजो हर इक चाह को
ओस की बूंद से भी तनिक ना हिले
प्यास से सूखे-झुलसे हुए होंठ के
दूर "वर्षा" करे सारे शिकवे-गिले
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
