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| Dr. Varsha Singh |
कट रहे हैं जंगलों के हाशिए
चांदनी ने रात भर आंसू पिए
अब नहीं वे डालियां जिन पर कभी
बुलबुलों ने प्यार के दो पल जिए
किस तरह उजड़ी हुई सी भूमि पर
रख सकेंगे उत्सवों वाले दिए
मैं नदी बन भी गई तो क्या हुआ
कौन जो सागर बने मेरे लिए
पर्वतों के पास तक पहुंचे नहीं
घाटियों ने खूब दुखड़े रो लिए
सूखते जल स्रोत बादलहीन नभ
वनकपोती की व्यथा मत पूछिए
दे रहे न्योता प्रलय ये स्वयं
आज मनु के वंशजों को देखिए
सर्पपालन का अगर है शौक तो
आस्तीनों में न अपने पालिए
आजकल "वर्षा" रदीफ़ों की जगह
अतिक्रमित करने लगे हैं काफ़िए
- डॉ. वर्षा सिंह

