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Dr. Varsha Singh |
कट रहे हैं जंगलों के हाशिए
चांदनी ने रात भर आंसू पिए
अब नहीं वे डालियां जिन पर कभी
बुलबुलों ने प्यार के दो पल जिए
किस तरह उजड़ी हुई सी भूमि पर
रख सकेंगे उत्सवों वाले दिए
मैं नदी बन भी गई तो क्या हुआ
कौन जो सागर बने मेरे लिए
पर्वतों के पास तक पहुंचे नहीं
घाटियों ने खूब दुखड़े रो लिए
सूखते जल स्रोत बादलहीन नभ
वनकपोती की व्यथा मत पूछिए
दे रहे न्योता प्रलय ये स्वयं
आज मनु के वंशजों को देखिए
सर्पपालन का अगर है शौक तो
आस्तीनों में न अपने पालिए
आजकल "वर्षा" रदीफ़ों की जगह
अतिक्रमित करने लगे हैं काफ़िए
- डॉ. वर्षा सिंह
मैं नदी बन भी गई तो क्या हुआ
जवाब देंहटाएंकौन जो सागर बने मेरे लिए ...
बहुत ही कमाल का शेर ... दिल को छूता है ... पूरी ग़ज़ल लाजवाब है ...
Digamber Naswa ji,
हटाएंबहुत बहुत आभार
🙏🍁🙏
आपकी लिखी रचना "मुखरित मौन में" शनिवार 17 नवम्बर 2018 को साझा की गई है......... https://mannkepaankhi.blogspot.com/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंYashoda Agrawal जी,
हटाएंहार्दिक आभार 🙏❤🙏
अब नहीं वे डालियां जिन पर कभी
जवाब देंहटाएंबुलबुलों ने प्यार के दो पल जिए
किस तरह उजड़ी हुई सी भूमि पर
रख सकेंगे उत्सवों वाले दिए !!!!
हर शेर कमाल का है वर्षा जी | पूरी रचना शानदार है | नये रंग की इस रचना के लिए सस्नेह बधाई |
हर शेर गहरे अर्थ लिए है। बहुत सुंदर लगी रचना वर्षा जी। सादर बधाई।
जवाब देंहटाएंबेमिसाल कृति, सत्य का चेहरा दिखाई आशंका एक वीभत्स सच की ।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद कुसुम जी
हटाएंबेहतरीन गज़ल 👌👌👌
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
हटाएंबेहतरीन ग़ज़ल आदरणीया 👌
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