सच तो ये है
- डॉ. वर्षा सिंह
रेशमी फूल हवा भी ताज़ा
ख़त मेरे नाम क्यों नहीं आया
झील में अक़्स देखना मुश्किल
इस तरफ हैं शजर, उधर छाया
दौड़ती- भागती हुई दुनिया
इस सड़क को कहीं नहीं जाना
सच तो ये है कि एक ख़ामोशी
कह रही आज शोर की गाथा
धुपधुपाती है मोमबत्ती सी
सांस का देह से यही नाता
उम्र मेरी तमाम भीग गई
चूम कर वो गया मेरा माथा
शीत-"वर्षा" का ये अजब मौसम
बर्फ सी रात, दिन हुआ पारा
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह - "सच तो ये है" से)
