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रविवार, दिसंबर 20, 2020

कल शाम कहा उसने | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

कल शाम कहा उसने

           -  डॉ. वर्षा सिंह


कल शाम कहा उसने, फूलों की ग़ज़ल कह दो

'वर्षा' हो ज़रा बरसो, बूंदों की ग़ज़ल कह दो 


अब और न गूंथो यूं , चोटी में उदासी को 

ख़ुशियों की लहर देकर, जूड़ों की ग़ज़ल कह दो 


इंसान को मत बांधो, मज़हब के रदीफ़ों में

अपनी तो बहुत कह ली, दूजों की ग़ज़ल कह दो


फुटपाथ पे घुट-घुट के, दम तोड़ रहा बचपन

आंचल की हवा देकर, झूलों की ग़ज़ल कह दो


हालात की हद तय है, हर दौर बदलता है 

कानों में अमीरी के, भूखों की ग़ज़ल कह दो 


"वर्षा" का समंदर से रिश्ता तो पुराना है 

चाहत के, इबादत के, रूपों की ग़ज़ल कह दो


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)