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| Dr. Varsha Singh |
हर बूंद पढ़ रही है ....
- डॉ. वर्षा सिंह
मेरे लिए बना वो रेशम की ओढ़नी
उसके लिए न पूछो मैं क्या नहीं बनी
चाहत के इक भंवर में उलझी हुई नदी
मुट्ठी में क़ैद जैसे हीरे की इक कनी
सपनों के पर जलाकर ख़ामोश हो गई
रातों की आंच लेकर सुलगी जो चांदनी
ताज़्जुब तो ये है दुनिया इक फूल के लिए
कोहरे-सी सर्द, ज़हरी, काली घनी-घनी
जुड़ने के, टूटने के आदिम-से सिलसिले
चिर कर हुई है अक्सर दो फांक रोशनी
मीठी छुवन की "वर्षा" भीगी इबारतें
हर बूंद पढ़ रही है सदियों से सनसनी
(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
