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| Dr. Varsha Singh |
फ़र्क
-डॉ. वर्षा सिंह
अपने गांव - शहर का पत्थर, भला सभी को लगता है
चाक हृदय हो जाता है जब कभी कहीं वह बिकता है
पकने को दोनों पकते हैं, फ़र्क यही बस होता है
नॉनस्टिक में सुख पकते हैं, हांडी में दुख पकता है
नाम वही चल पाता है जो यहां बिकाऊ होता है
उसे भुलाया जाता है जो स्वाद ज़हर का चखता है
गंगा घाट निवासी भैया, सागर के दुख क्या जानों !
जग के दर्द छुपाए मन में, सबसे हंसकर मिलता है
तथाकथित चाहत का मलबा ढोना भी है नादानी
"वर्षा के सपनों में लेकिन सावन हरदम पलता है
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
