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http://youtu.be/EkK4JiEfHus
हुसैन बंधुओं द्वारा मेरी इस ग़ज़ल को गाया गया है-
इक न इक दिन फ़ैसला होगा ज़रूर।
वक्त ने उसको छला होगा ज़रूर।
पांव में छाले यूं ही होते नहीं
कुछ क़दम तो वो चला होगा ज़रूर।
बेवज़ह तनहाइयां भाती नहीं
इश्क़ का ये मामला होगा ज़रूर।
ताकि ‘वर्षा’ हो सके कल फिर सुबह
इसलिए सूरज ढला होगा ज़रूर।
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