मंगलवार, दिसंबर 12, 2017

शाम आई ..

शुभ संध्या मित्रों,

फिर नयी इक शाम आई
साथ अपने  रात  लाई

एक मिसरा दोस्ती तो
एक मिसरा बेवफाई

कुछ यहां लिखना कठिन है
काग़जों पर रोशनाई

और कब तक बच सकेंगे
वक़्त की दे कर दुहाई

किस तरह स्वेटर बुनें हम
बीच से टूटी सलाई

क्या कहें " वर्षा" किसी को
ग़म हुए हैं एकजाई
   
     ❤ - डॉ. वर्षा सिंह

सोमवार, नवंबर 27, 2017

एक ग़ज़ल दिल के नाम ....

आज बदली हुई सी सरगम है
सिर उठाने लगा हर इक ग़म है

पढ़ न पाओगे भाव चेहरे के
रोशनी भी यहां ज़रा कम है

दे रहा था जो वास्ता दिल का
हाथ में आज उसके परचम है

घाव जिसने दिया है तोहफे में
दे रहा शख़्स वो ही मरहम है

यूं तो ख़ामोश घटायें "वर्षा"
आंख भीगी, हवा हुई नम है

- डॉ वर्षा सिंह

एक ग़ज़ल चांद पर ....

रात के माथे टीका चांद
खीर सरीखा मीठा चांद

हंसी चांदनी धरती पर
आसमान में चहका चांद

महकी बगिया यादों की
लगता महका महका चांद

उजली चिट्ठी  चांदी- सी
नाम प्यार के लिखता चांद

"वर्षा" मांगे दुआ यही
मिले सभी को अपना चांद

- डॉ वर्षा सिंह

सोमवार, नवंबर 20, 2017

Me & My Mother

मेरी माताश्री श्रीमती डॉ. विद्यावती " मालविका "  हिन्दी साहित्य की विदुषी लेखिकाओं में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। " बौद्ध धर्म पर मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य का प्रभाव " विषय में पीएच.डी उपाधि प्राप्त डॉ. विद्यावती " मालविका "  की लगभग 40 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

मेरी छः ग़ज़लें सामयिक सरस्वती में

प्रिय मित्रो, हिन्दी साहित्य जगत् की लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण पत्रिका ‘‘सामयिक सरस्वती’’ के अक्टूबर-दिसम्बर 2017 अंक में मेरी छः ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं।

शुक्रवार, नवंबर 10, 2017

Hello Everyone

सूर्य हुआ फिर उदित
प्रकृति हो गई मुदित
  
हो कब कैसे क्या - क्या
नहीं किसी को विदित
      .  🌞☀- डॉ. वर्षा सिंह