बुधवार, अप्रैल 11, 2018

क़िताबें

नया रंग जीवन में भरती क़िताबें 📗
कड़ी धूप में छांह बनती क़िताबें  📙
सफ़ह दर सफ़ह अक्षरों को सजाती,
दुनिया को सतरों से बुनती क़िताबें 📘
अजब रोशनी सी बिखरती हमेशा,
तिलस्मी झरोखों सी खुलती क़िताबें 📖
जब  भी  सताती  हैं  यादें पुरानी ,
नयी इक कहानी सी कहती क़िताबें 📕
"वर्षा" क़िताबों से है प्यार जिनको,
दिलों-जां से उनको लुभाती क़िताबें 📒
      📚- डॉ. वर्षा सिंह

शनिवार, अप्रैल 07, 2018

दुनिया

सपनों की सियाही से
लिख- लिख के थकी "वर्षा"
ख़त लौट के वो आया
था जिसका पता दुनिया
       डॉ. वर्षा सिंह

गुरुवार, मार्च 29, 2018

सूखा फूल मिला हो जैसे..... डॉ. वर्षा सिंह



भूली बिसरी याद जाग कर हलचल करती है दिल में
सूखा फूल मिला हो जैसे किसी पुराने नाविल में

एक हंसी दे जाता है और एक ख़ुशी ले जाता है
फ़र्क यही होता है जीवनदाता में और क़ातिल में

होना क्या था और हुआ क्या, भेद न मन कर पाता है
अर्थ बदल जाते हैं अक़्सर सपनों वाली झिलमिल में

यूं तो सूची बहुत बड़ी है, "लाइक" करने वालों की
लेकिन दोस्त वही सच्चा है काम जो आये  मुश्किल में

"वर्षा" नफरत के बदले में नफरत ही हासिल होती         छिपी हुई रहती है दुनिया नन्हीं सी इस्माइल में

🌹- डॉ. वर्षा सिंह

बुधवार, मार्च 28, 2018

मन कहीं लगता नहीं

कह दिया मौसम ने सब कुछ, किन्तु वो समझा नहीं
क्या पता समझा भी हो तो, कुछ कभी कहता नहीं
ज़िंदगी में यूं भी पहले उलझनें कुछ कम न थीं
की जो सुलझाने की कोशिश, कुछ मगर सुलझा नहीं
भीड़ में, एकांत में, गुलज़ार में, वीरान में
कौन जाने क्या हुआ है, मन कहीं लगता नहीं
इस क़दर बदले हुए हैं, बंधनों के मायने
है खुला पिंजरा, परिंदा अब मगर उड़ता नहीं
लाख कोशिश कीजिये, "वर्षा" यकीनन जानिये
लग कभी सकता किसी की, सोच पर पहरा नहीं
- डॉ. वर्षा सिंह

रविवार, मार्च 25, 2018

क्या किया, सोचो कभी तो

बेबसी में ज़िन्दगानी
बोतलों में बंद पानी
काटना होगा जो बोया
है यही चिंता पुरानी
नीर के स्त्रोतों से कब तक
और होगी छेड़खानी
कल धरा का रूप क्या हो !
दिख रही जो आज धानी
गर नहीं सत्ता रहेगी
कौन राजा, कौन रानी !
क्या किया, सोचो कभी तो
गुम कुंआ, नदिया सुखानी
काटना होगा जो बोया
रीत दुनिया की पुरानी
रह न जाये याद बन कर
बूंद-"वर्षा" की कहानी
- डॉ. वर्षा सिंह

शहीदों को नमन



चल दिये थे वो अकेले, काफ़िला देखा नहीं
देश को देखा था, अपना फ़ायदा देखा नहीं
बांध कर सिर पर कफ़न निकले थे जो बेख़ौफ़ हो
मंज़िलों पर थी नज़र फिर रास्ता देखा नहीं
देश को आज़ाद करने का ज़ुनूं दिल में लिए
हंस के बंदी बन गये थे, कठघरा देखा नहीं
उन शहीदों को नमन है, जो वतन पर मिट गये
ताज कांटों का पहन कर आईना देखा नहीं
राजगुरु, सुखदेव, "वर्षा", भगत सिंह, आज़ाद ने
आंधियों में आशियों का आसरा देखा नहीं
  -  डॉ. वर्षा सिंह