मंगलवार, जनवरी 26, 2021

लौ न गणतंत्र की बुझने पाए | ग़ज़ल | शुभ गणतंत्र दिवस | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh


लौ न गणतंत्र की बुझाने पाए


       - डॉ. वर्षा सिंह


हमने दिल में ये आज ठानी है

एक दुनिया नई बसानी है


जिनके हाथों में क़ैद है क़िस्मत

हर ख़ुशी उनसे छीन लानी है


दिल के सोए हुए चरागों में

इक नई रोशनी जगानी है


दहशतों से भरा हुआ है चमन

एकता की कली खिलानी है


जंगजूओं की महफ़िलों में हमें

प्यार की इक ग़ज़ल सुनानी है


देश आज़ाद रहेगा अपना

इसमें गंगो-जमन का पानी है


लौ न गणतंत्र की बुझाने पाए

ये शहीदों की इक निशानी है


लाख ज़ुल्म-ओ-सितम किए जाएं

अम्न की आरती सजानी है


हिन्द की सरज़मीन जन्नत है

इस पे क़ुर्बान हर जवानी है


तआरुफ़ पूछिए न "वर्षा" का

मेघ और बूंद की इक कहानी है

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शनिवार, जनवरी 23, 2021

उलझनों का दौर है | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

उलझनों का दौर है


           -डॉ. वर्षा सिंह


प्रचार, पक्षपात और अनबनों का दौर है 

फूल-फल रहा है झूठ, उलझनों का दौर है 


स्वांग और सत्य में न भेद कोई शेष है 

टूट कर झरी है चाह, किरचनों का दौर है 


सदी बदल गई मगर नदी तो रेत-रेत है 

क्या कभी बुझेगी प्यास, चिन्तनों का दौर है 


फटे तो बीज की तरह, हुए भी अंकुरित मगर 

हो सके हरे न ख़्वाब, दुश्मनों का दौर है 


सोच और सोच के सिवा न कुछ भी और है

जोर-शोर से है खोज, मन्थनों का दौर है 


मुक्ति भी यकीन है कभी मिलेगी शर्तिया 

आजकल भले है क़ैद, बन्धनों का दौर है 


न ठौर "वर्षा" पा सकी, न ठौर मेघ पा सके

वक़्त रच रहा है खेल, अड़चनों का दौर है


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)

शुक्रवार, जनवरी 22, 2021

बदलाव नहीं | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

बदलाव नहीं

      

               -डॉ. वर्षा सिंह


वर्षों से ज्यों की त्यों चर्या, रत्ती भर बदलाव नहीं 

घर - दफ्तर की भाग दौड़ में व्याकुल मन, बहलाव नहीं 


जीवन की अनजान डगर, क्या सफ़र इसी को कहते हैं !

बोझिल सांसें, थके पांव से चलना है ठहराव नहीं 


दुनिया अलग बसाने वालो, दुनिया का मतलब समझो !

दुनिया ऐसी हो, जिसमें हो भेदभाव, अलगाव नहीं 


वस्तु न बन कर रह जाएं हम, विनिमय के बाज़ारों में

सुलझे हों आयाम सभी, हो तनिक यहां उलझाव नहीं


आपाधापी के मौसम में यही कामना "वर्षा" की 

सिर्फ़ शांति की ही चर्चा हो, युद्ध नहीं, टकराव नहीं


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)


गुरुवार, जनवरी 21, 2021

फ़र्क | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh


फ़र्क

     -डॉ. वर्षा सिंह


अपने गांव - शहर का पत्थर, भला सभी को लगता है 

चाक हृदय हो जाता है जब कभी कहीं वह बिकता है 


पकने को दोनों पकते हैं, फ़र्क यही बस होता है

नॉनस्टिक में सुख पकते हैं, हांडी में दुख पकता है 


नाम वही चल पाता है जो यहां बिकाऊ होता है

उसे भुलाया जाता है जो स्वाद ज़हर का चखता है 


गंगा घाट निवासी भैया, सागर के दुख क्या जानों !

जग के दर्द छुपाए मन में, सबसे हंसकर मिलता है


तथाकथित चाहत का मलबा ढोना भी है नादानी

"वर्षा के सपनों में लेकिन सावन हरदम पलता है


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)

बुधवार, जनवरी 20, 2021

चांदनी | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh


चांदनी

  -डॉ. वर्षा सिंह


कोई छू पिघलती हुई चांदनी 

मेरा आंचल सुलगती हुई चांदनी 


चांद आया हज़ारों सितारे लिए 

दे गया इक महकती हुई चांदनी 


उसके हाथों से मौसम गिरा है वहां 

देखिए वो फिसलती हुई चांदनी 


प्यार की एक नीली नदी ज़िन्दगी 

डूबने को मचलती हुई चांदनी 


रजनीगंधा नहीं थाम पाई जिसे

ओढ़नी-सी सरकती हुई चांदनी


लोग ऐसे भी हैं देख पाए नहीं 

फ़ासलों से गुज़रती हुई चांदनी 


मुस्कुराहट बनी तो कभी बेबसी

रूप अपना बदलती हुई चांदनी


एक सपना है तपती हुई धूप का 

बन के "वर्षा" बरसती हुई चांदनी


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)

मंगलवार, जनवरी 19, 2021

मुस्कुराओ ज़रा | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

मुस्कुराओ ज़रा

          -डॉ. वर्षा सिंह


एक लय है ख़ुशी, गुनगुनाओ ज़रा 

मुझको मुझसे कभी तो चुराओ ज़रा 


कौन जाने कहां सांस थम कर कहे -

"अलविदा !" दोस्तो, मुस्कुराओ ज़रा 


रूठने की वज़ह कोई हो या न हो 

कोई अपना जो रूठे मनाओ ज़रा 


मैंने देखा है फूलों को झरते हुए 

आंसुओं के न मोती लुटाओ ज़रा 


लोरियों ने सुलाया मुझे ख़्वाब में 

ख्वाब टूटे न, ऐसे जगाओ ज़रा 


मेरे आंचल में ठहरा है मौसम कोई 

एक मिसरा उसे भी सुनाओ ज़रा 


मेरी सांसों ने चुपके से मुझसे कहा -

'तुम हो "वर्षा", बरस के दिखाओ ज़रा'



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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)

सोमवार, जनवरी 18, 2021

प्यार का दीपदान | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh


प्यार का दीपदान


  -डॉ. वर्षा सिंह


आंच दिन की न रात को ठहरी 

मुट्ठियों में बंधी न दोपहरी 


प्यार का दीपदान कर आए 

हो गई और भी नदी गहरी 


फूल की देह में चुभा मौसम 

दर्द से हो गई हवा दुहरी 


क़ब्र में भी न चैन रिश्तों को 

इस क़दर दौर ये हुआ ज़हरी 


वास्ता है तो सिर्फ़ मतलब का 

सारे एहसास हो गए शहरी 


चींखना भी फ़िज़ूल है "वर्षा" 

गांव बहरा, है ये गली बहरी


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)