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Dr. Varsha Singh |
मेरी ग़ज़ल प्रवासी श्रमिकों के प्रति ... "क्या दे पाएगा देहात"...यह आज web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 13.05.2020 में प्रकाशित हुई है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=32540
*ग़ज़ल* संदर्भ : प्रवासी श्रमिक
क्या दे पाएगा देहात
-डॉ. वर्षा सिंह
पत्ता-पत्ता दिन मुरझाया, फूल-फूल मुरझायी रात।
चर्चाओं के दौर चले पर, रही अधूरी उसकी बात।
"मैं" और "हम" के बीच फ़ासला, शर्तों से कब मिट पाया,
प्यार कहां तब शेष रहा जब, जीत-हार की बिछी बिसात।
ऊंचे पद पा लिए सिफ़ारिश, रिश्तेदारी के चलते,
टिकी रही निचली सतहों पर किन्तु विचारों की औक़ात।
कड़वे सच के कौर घुटक कर जैसे-तैसे आए हैं,
शहरों से खाली लौटों को, क्या दे पाएगा देहात।
अक्सर कोई भीगा बाहर, कोई भीतर से भीगा,
"वर्षा" में सब भीगे लेकिन, एक न हो पाई बरसात।
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आपका कलम से निकली बहुत खूसूरत ग़ज़ल।
जवाब देंहटाएंअत्यंत विनम्रतापूर्वक आपकी इस टिप्पणी के प्रति हार्दिक आभार आदरणीय शास्त्री जी🙏
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंमार्मिक रचना जिसका हरेक शेर जीवन की सच्चाइयों से रूबरू करवाता है |
जवाब देंहटाएंऊंचे पद पा लिए सिफ़ारिश, रिश्तेदारी के चलते,
टिकी रही निचली सतहों पर किन्तु विचारों की औक़ात।
यही है बहुधा रसूखदारों का कडवा सच |