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| Dr. Varsha Singh |
कच्ची नींदें, ख़्वाब अधूरे
- डॉ. वर्षा सिंह
तेरा-मेरा एक किस्सा है
दुख से घना-घना रिश्ता है
तेरी आंख में आंसू आए
मेरे दिल में कुछ चुभता है
कच्ची नींदें, ख़्वाब अधूरे
पत्ता-पत्ता जाग रहा है
ख़ामोशी कब चुप रहती है
हमने अक्सर उसे सुना है
सुख के मौसम आते-जाते
दुख का स्थाई डेरा है
'पियू-पियू' रटता रहता है
तन का पिंजरा, मन तोता है
"वर्षा" के आंचल में बूंदें
वक़्त का दरिया ख़ुश्क पड़ा है
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
