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शुक्रवार, दिसंबर 25, 2020

कच्ची नींदें, ख़्वाब अधूरे | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

कच्ची नींदें, ख़्वाब अधूरे 

-  डॉ. वर्षा सिंह


तेरा-मेरा एक किस्सा है 

दुख से घना-घना रिश्ता है 


तेरी आंख में आंसू आए 

मेरे दिल में कुछ चुभता है 


कच्ची नींदें, ख़्वाब अधूरे 

पत्ता-पत्ता जाग रहा है 


ख़ामोशी कब चुप रहती है 

हमने अक्सर उसे सुना है 


सुख के मौसम आते-जाते 

दुख का स्थाई डेरा है 


'पियू-पियू' रटता रहता है 

तन का पिंजरा, मन तोता है 


"वर्षा" के आंचल में बूंदें 

वक़्त का दरिया ख़ुश्क पड़ा है


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)