ग़ज़लसंग्रह - सच तो ये है लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ग़ज़लसंग्रह - सच तो ये है लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, फ़रवरी 18, 2021

हादसों की ख़बर | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

हादसों की खबर

    

          - डॉ. वर्षा सिंह


रात भर नींद क्यों टूटती रह गई 

मैं हवा से वज़ह पूछती रह गई 


इत्तेफ़ाक़न हुआ या कि साज़िश हुई 

ख़ुद नदी धार में डूबती रह गई 


इस तरफ है अंधेरा, उधर घोर तम

रोशनी बीच में झूलती रह गई


हादसों की खबर रोज़ अख़बार में 

देखकर, हर सुबह बूझती रह गई 


घर से निकला था, स्कूल पहुंचा नहीं

एक  बेटे  को  मां  ढूंढती रह गई


एक लम्हा खुशी का न ठहरा यहां 

देहरी आहटें चूमती रह गई 


प्यास को झील की थी ज़रूरत मगर

बांसवन में फंसी घूमती रह गई 


एक बादल न "वर्षा" का अपना हुआ

ज़िन्दगी आग से जूझती रह गई 


--------------


(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)

शुक्रवार, दिसंबर 25, 2020

कच्ची नींदें, ख़्वाब अधूरे | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

कच्ची नींदें, ख़्वाब अधूरे 

-  डॉ. वर्षा सिंह


तेरा-मेरा एक किस्सा है 

दुख से घना-घना रिश्ता है 


तेरी आंख में आंसू आए 

मेरे दिल में कुछ चुभता है 


कच्ची नींदें, ख़्वाब अधूरे 

पत्ता-पत्ता जाग रहा है 


ख़ामोशी कब चुप रहती है 

हमने अक्सर उसे सुना है 


सुख के मौसम आते-जाते 

दुख का स्थाई डेरा है 


'पियू-पियू' रटता रहता है 

तन का पिंजरा, मन तोता है 


"वर्षा" के आंचल में बूंदें 

वक़्त का दरिया ख़ुश्क पड़ा है


--------------


(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)