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| Dr. Varsha Singh |
हादसों की खबर
- डॉ. वर्षा सिंह
रात भर नींद क्यों टूटती रह गई
मैं हवा से वज़ह पूछती रह गई
इत्तेफ़ाक़न हुआ या कि साज़िश हुई
ख़ुद नदी धार में डूबती रह गई
इस तरफ है अंधेरा, उधर घोर तम
रोशनी बीच में झूलती रह गई
हादसों की खबर रोज़ अख़बार में
देखकर, हर सुबह बूझती रह गई
घर से निकला था, स्कूल पहुंचा नहीं
एक बेटे को मां ढूंढती रह गई
एक लम्हा खुशी का न ठहरा यहां
देहरी आहटें चूमती रह गई
प्यास को झील की थी ज़रूरत मगर
बांसवन में फंसी घूमती रह गई
एक बादल न "वर्षा" का अपना हुआ
ज़िन्दगी आग से जूझती रह गई
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)

