मंगलवार, दिसंबर 08, 2020

किसान | अन्नदाता | ग़ज़ल | शायरी | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

ग़ज़लों के आईने में किसान
             - डॉ. वर्षा सिंह

हमारा देश कृषि प्रधान देश है और किसान हमारे अन्नदाता हैं। परिस्थितियोंवश इन दिनों किसान आंदोलन से पूरे देश प्रभावित हो रहा है। नित नए समाचार, बहसें, दलीलें और चर्चाएं... नए कृषि कानूनों को वापस लेने और फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी की मांग को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं ।
आज 08 दिसम्बर को किसान संगठनों के आह्वान पर "भारत बंद" की सरगर्मी है। 
तो प्रिय ब्लॉग पाठकों, मैं आज यहां अपने इस ब्लॉग "ग़ज़लयात्रा" में प्रस्तुत कर रही हूं हमारे अन्नदाता किसानों के प्रति समर्पित कुछ चुनिंदा कवियों/शायरों की शायरी और ग़ज़लें।

हलाल रिज़्क़ का मतलब किसान से पूछो 
पसीना बन के बदन से लहू निकलता है
      - आदिल रशीद

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शाइ'र हूँ मैं लफ़्ज़ों का मसीहा
ऐ काश मैं इक किसान होता
      - रिफ़अत सरोश

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हंसिये की ज़ंग छुड़ाने में रत हैं किसान
है नई नोक दे रहा है मजूर कुदाली को
नभ बसा रहा है नए सितारों की बस्ती
भू लिए गोद में नए ख़ून की लाली को.
            - गोपालदास 'नीरज'

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तिरे किसान के सीने में हसरतों का हुजूम
तिरी फ़ज़ाओं में हर बेटी माँ बहन मग़्मूम
   - यूसुफ़ राहत

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ईंट उगती देख अपने खेत में
रो पड़ा है आज दिल किसान का
     - इरशाद ख़ान सिकंदर

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बारिश में खेत ऐसी तरह से नहाए है
रौनक़ हर इक किसान के चेहरे पे आए है
    - नज़ीर बनारसी

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बनाएँगे नई दुनिया किसान और मज़दूर
यही सजाएँगे दीवान-ए-आम-ए-आज़ादी
    - फ़िराक़ गोरखपुरी

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मिला न खेत से उस को भी आब-ओ-दाना क्या
किसान शहर को फिर इक हुआ रवाना क्या
    - सौरभ शेखर

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बारिशें जाड़े की और तन्हा बहुत मेरा किसान
जिस्म और इकलौता कम्बल भीगता है साथ साथ
     - परवीन शाकिर

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गंदुम की बालियों से बहुत रौशनी हुई
इस रौशनी से क़र्ज़ न उतरा किसान का
     - अहमद फ़ाख़िर

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मैं वो किसान हूँ खेती पे बर्क़ ने जिस की
दुआ जो मेंह के लिए की तो आग बरसाई
     - शाद लखनवी

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मशीन बोना है जिन का पेशा उन्हें ज़मीं बेच दी है तुम ने
किसान हो कर ख़ुद अपनी मिट्टी पलीद करने की ठान ली है
   - ऐनुद्दीन आज़िम

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हो 'फ़ख़्र' ख़ाक मुझे क़ौम की तरक़्क़ी पर
जो फ़र्द-ए-क़ौम ये मज़दूर और किसान नहीं
    - फख्र ज़मान

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वो अन्नदाता है, जिसे कहते किसान हैं
यूं तो नहीं है कुछ भी, लेकिन महान हैं
   - अनिल त्रिपाठी

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तमाम एक सी शक्लें हैं हिंदिसों की तरह
किसान हैं जो अभी खेतियों से पलटे हैं
  - अली सरदार जाफ़री

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न ऐसे लौंग घुमा नाक में हसीं मुटियार
जो हल चलाते हैं कोई किसान गिर जाए
  - मुसव्विर सब्ज़वारी

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किसान खेतों से घर न जा पाया सोचता था
इकट्ठी पहले मैं उम्र-भर की कपास कर लूँ
     - ज़ीशान साजिद

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ज़मीन-ए-कर्ब की हर फ़स्ल का जो मालिक है
हमारे दर्द के रिश्ते इसी किसान से हैं
    - रज़ा मौरान्वी

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अभी किसान-ओ-कामगार राज होने वाला है
अभी बहुत जहाँ में काम-काज होने वाला है
   - फ़िराक़ गोरखपुरी

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तमाम फ़सलें उजड़ चुकी हैं न हल बचा है न बैल बाक़ी
किसान गिरवी रखा हुआ है लगान पानी में बह रहा है
   - शकील आज़मी

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ये चारा-गाह ये रेवड़ ये मवेशी ये किसान
सब के सब मेरे हैं सब मेरे हैं सब मेरे हैं
    - साहिर लुधियानवी

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किसान दिल-शाद खेत आबाद हैं वहाँ के
सफ़ेद भेड़ें हैं सब्ज़ चारे हैं उस किनारे
   - शब्बीर शाहिद

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मिले नया सब को एक जीवन चमन खिलें खेत लहलहाएँ
हवा मोहब्बत का राग अलापे किसान धरती के गीत गाएँ
    - नज़ीर बनारसी

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फ़सलों का ख़्वाब भूख की आँखों में रह गया
गाँव के खेत खा गए लेकिन किसान तक
     - ताैफ़ीक़ साग़र

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काँधे पर हल धरे किसान। 
करता खेतों को प्रस्थान।।

मत कहना इसको इंसान।
यह धरती का है भगवान।।
  - डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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बाँझ हो जाती है ज़मीं नक़ल बाज़ार की करता है जब किसान 
सरकार को आता है पसीना पसीने की कमाई का भाव  जब माँगता है किसान।  
- रवीन्द्र सिंह यादव 

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किसान की कमर पर मार हथौड़ा ,
प्लास्टिक की बनी  सब्जी-तरकारी,
शौहरत की महक में मरी मानवता ,
दिखावे  में  डूबी  जनता  बेचारी, 
   - अनीता सैनी

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ज़िंदगी में आ गया  मसला बड़ा है
अन्नदाता आज सड़कों पर खड़ा है

जिस तरह सरहद पे रक्षक जूझते हैं
मुश्क़िलातों   से   हमेशा  वो लड़ा है

मूल्य मिल जाए फसल का, कर्ज़ उतरे
हो फ़सल अच्छी, यही दिल में जड़ा है

ख़ुदकुशी करना पड़े जब खेतिहर को
जान लो, वह  दौर  बेहद  ही  कड़ा है

 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
                
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सियासत नहीं हैं, किसानों की बातें।
तिज़ारत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

खेती, किसानी नहीं सब के बस की
नफ़ासत नहीं हैं, किसानों की बातें।

पसीना  बहाए,    लहू  को  सुखाए
शरारत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

भले ही  अंगूठा  लगा कर  जिए वो
ज़हालत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

जो हक़ मांगने को, उठाए वो बांहें
बग़ावत  नहीं हैं, किसानों की बातें।

'शरद' वो नहीं हैं किसी के भी दुश्मन
अदावत नहीं  हैं,  किसानों की बातें।

             - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

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वो जो कड़वी ज़ुबान होते हैं, 
एक तन्हा मचान होते हैं.

चुप ही रहने में है समझदारी, 
कुछ किवाड़ों में कान होते हैं.

एक दो, तीन चार, बस भी करो, 
लोग चूने का पान होते हैं.

उम्र है लोन, सूद हैं सासें, 
अन्न-दाता, किसान होते हैं.

गोलियाँ, गालियाँ, खड़े तन कर,
फौज के ही जवान होते हैं. 
 
जो नहीं हैं रियाज़ के आदी,
एक टूटी सी तान होते हैं.
 
रख दिए साहूकार पे गिरवी,
हाथ खेतों की धान होते हैं.
           - दिगम्बर नासवा 

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नन्ही -नन्ही बूंदों ने जब अपना राग सुनाया 
व्याकुल किसान की व्याकुलता को ,हुलसाया -हर्षाया !

हल--बैलों की जुगल बंदी संग, धरती ने ली तान
झम -झमा झम , झम--झम ,झम--झम बरखा गाये गान !

हल चलाते कृषक अधरों पर ,खेल रही मुस्कान 
भूल गया वो ताप , पसीना , सूरज का अभिमान !

लहलहाती फसल करेगी जब ,अभिनन्दन ,सम्मान 
बीज -धरा का मिलन रखेगा ,परिश्रमी किसान का मान 
    - अरुणा 

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हर किसान कै फटी ज़ेब, पेटौ खाली
अपनी अपनी किस्मत के बटवारे हैं

कहैं मिठाई लाल कि ग़ाफ़िल सुगर भवा
दीवाली मा फूटे भाग हमारे हैं
    - चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’

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धरती के अंक से लग कर बिना कोई भेद किये 
सबकी एकता का सूत्र है जो भूमि पुत्र है वो 
       -यशवन्त माथुर

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मुँह अँधेरे किसान चल दिया
खेतो की ओर
जी तोड़ मेहनत नतीजा मुट्ठी भर
  - मीना भारद्वाज

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कीमत तो खूब बढ़ गई दिल्ली में धान की,
लेकिन विदा न हो सकी बेटी किसान की
    - सत्यप्रकाश

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और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी यानी इस ब्लॉग लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की ग़ज़लों से कुछ शेर ....

(1)
जहां पे आज रेत है, वहीं पे थी नदी कभी
जले थे प्रेम के दिये, हुई थी रोशनी कभी

उदास है किसान, कर्ज के तले, दबा हुआ
दुखों की छांव है वहां, रही जहां ख़ुशी कभी

अनेकता में एकता, ही हमारी शक्ति है
देशभक्ति की डगर, अलग नहीं रही कभी

जहां पे ”वर्षा” हो रही है, गोलियों की इन दिनों
वहां पे अम्नो-चैन की, बजेगी बांसुरी कभी
     - डॉ. वर्षा सिंह

और....

(2)

फांसी पे लटके बाप के शव से लिपट- लिपट
रोयी थी ज़ार-ज़ार वो बेटी किसान की

हल्कू हुआ है ज़िन्दा, हर रात पूस की
फ़सलों के बीच यादें टूटे मचान की

कुचले गए हैं कर्ज़ में कितने हसीन ख़्वाब
धरती सुना रही है गाथा लगान की
         - डॉ. वर्षा सिंह

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शुक्रवार, नवंबर 27, 2020

कहां आ गए | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

ग़ज़ल


कहां आ गए

- डॉ. वर्षा सिंह


हम कहां से चले थे कहां आ गए 

सोचिए तो जरा दर्द क्यों भा गए 


बूंद बरसी न फूलों लदी डालियां

फूल खिलने से पहले ही मुरझा गए 


लोग फसलें उगाने चले रेत में 

खेत में तो बबूलों के दिन आ गए


उनसे उम्मीद थी कुछ कहेंगे नया 

बात मेरी वही आज दोहरा गए


आंधियां दहशतों की चलीं इस कदर 

त्रास के मेघ काले घने छा गए 


अब कहां है वो 'चाणक्य' जो ज्ञान दे

'नंद' विजयी हुआ, मात हम खा गए


पूजिए पूजना है जिसे आपको 

हम तो "वर्षा" ज़माने से उकता गए


#ग़ज़लवर्षा #ग़ज़ल #कहां_आ_गए


शुक्रवार, नवंबर 20, 2020

अपना दोष यही | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

अपना दोष यही

         - डॉ. वर्षा सिंह

सच की मूरत ढाली, अपना दोष यही
गढ़ी न सूरत जाली, अपना दोष यही

न्यायालय से न्याय न वर्षों मिल पाया
जेबें अपनी खाली, अपना दोष यही

हंसी-ठिठोली के मंचों से दूर रही
ग़ज़ल व्यथाओं वाली, अपना दोष यही

कैसे दिन को रात कहें, रातों को दिन
दुनिया देखी-भाली, अपना दोष यही

एक हाथ से कभी किसी भी अवसर पर
बजा ना पाए ताली, अपना दोष यही

युग के रंजीत परिधानों से दूर सदा
ओढ़ी "कमली-काली" अपना दोष यही

खर-पतवार भरे खेतों की बाहों में
ढूंढी जौ की बाली, अपना दोष यही

सपनों की भी मृगमरीचिका क्या कहिए
आयु व्यर्थ खो डाली, अपना दोष यही

अपनी विपदाएं ही "वर्षा" क्या कम थीं
जग की विपदा पाली, अपना दोष यही

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#ग़ज़ल #दोष #कमली #ग़ज़लवर्षा #मृृृगमरीचिका

गुरुवार, नवंबर 12, 2020

दीप का त्यौहार है दीपावली | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

        दीप का त्यौहार है दीपावली
                              - डॉ. वर्षा सिंह
दीप का त्यौहार है दीपावली
शीत का श्रृंगार है दीपावली

रह न पाए मैल मन में रंच भर
ज्योति की जलधार है दीपावली

मावसी पीड़ा मिटाने आ गई
हर्ष की झंकार है दीपावली

रह न जाए स्वप्न कोई भी अधूरा
कुमकुमी उपहार है दीपावली

दूर हमसे हो बुराई की डगर
शुभ-पलों का द्वार है दीपावली

आपसी मतभेद सारे भूलिए
प्रीत की मनुहार है दीपावली

हो रही आलोक "वर्षा" हर तरफ़
तिमिर का प्रतिकार है दीपावली
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#दीपावली #ग़ज़ल #ज्योति

बुधवार, नवंबर 04, 2020

मत कहो "वर्षा" कहानी दूर दिल्ली की | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह


ग़ज़ल

मत कहो "वर्षा" कहानी दूर दिल्ली की

                 - डॉ. वर्षा सिंह


गांव के भीतर वही, जो गांव के बाहर

आजकल हर ओर ठोकर दे रहे पाथर


क्यारियां सूखी पड़ी हैं नीर का संकट

अब नहीं बिछती हरीली घास की चादर


कौड़ियों के मोल बिकता आदमी का श्रम

आदमी ज्यों हो गया है फालतू डांगर


झूठ-मक्कारी शहर की वायु में शामिल

गुम गया शीतल-मधुर सुख-चैन का चांवर


हाथ में जिनके खिलौनों की जगह घूरा

बचपने में ही थके बच्चे हुए जर्जर


एक्सरे की हर रपट में फेफड़े पढ़ते

छिद्र वाले मौत के काले बड़े आखर


चाय के दो घूंट आतों की जलन थामें

दो निवाले रोटियों के ढूंढते दिन भर


भूमि के पट्टे छिपाए रंज़िशों के मूल

ज़िन्दगी के नाम लिखते कचहरी अक्सर


मत कहो "वर्षा" कहानी दूर दिल्ली की

था जहां कल तक वहां है आज भी सागर

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#ग़ज़ल #सागर #दिल्ली #कचहरी #ज़िन्दगी


गुरुवार, अक्टूबर 01, 2020

बूढ़ी आंखें | ग़ज़ल | अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

बूढ़ी आंखें
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                       - डॉ. वर्षा सिंह

वक्त का दरपन बूढ़ी आंखें 
उम्र की उतरन बूढ़ी आंखें 

कौन समझ पाएगा पीड़ा 
ओढ़े सिहरन बूढ़ी आंखें 

जीवन के सोपान यही हैं 
बचपन, यौवन, बूढ़ी आंखें 

चप्पा चप्पा बिखरी यादें 
बांधी बंधन बूढ़ी आंखें 

टूटा चश्मा घिसी कमानी 
चाह की खुरचन बूढ़ी आंखें 

एक इबारत सुख की ख़ातिर 
बांचे कतरन बूढ़ी आंखें 

सपनों में देखा करती हैं
"वर्षा"- सावन बूढ़ी आंखें

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अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस ~ ग़ज़लयात्रा

मंगलवार, सितंबर 29, 2020

दिल से दिल की शायरी | विश्व हृदय दिवस पर विशेष | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

      प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज विश्व हृदय दिवस है 
❤ यानी दिल का दिन 😊
❤ Happy World Heart Day ❤
     दरअसल दुनिया भर के तमाम लोगों को हृदयरोगों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से वर्ष 2000 में 'विश्व हृदय दिवस' मनाने की शुरुआत की गई। पहले यह सितम्बर के अंतिम रविवार को मनाया जाता रहा था, लेकिन 2014 से इसे प्रति वर्ष 29 सितम्बर के दिन मनाया जाने लगा। 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' (डब्ल्यूएचओ) की भागीदारी से स्वयंसेवी संगठन 'वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन' हर साल 'विश्व हृदय दिवस' मनाता है।
इस वर्ष विश्व हृदय दिवस यानी World Heart Day की थीम है - 
Use heart to beat cardiovascular disease.
अर्थात् हृदय रोग को हराने के लिए दिल का उपयोग करें।
 यूं तो दिल के उपयोग की बात यहां भौतिक रूप से हृदय के स्वास्थ्य को ध्यान में रख कर की गई है लेकिन जब बात 'दिल' और 'दिल के रोग' की हो तो  .....और शायरों से बेहतर दिल के हालात से भला कौन वाकिफ़ होगा 😊

     जी हां, दुनिया में शायद ही कोई ऐसा शायर होगा जिसने दिल को ले कर कोई शायरी नहीं की होगी। यूं भी शायरी का वास्ता दिमाग़ से कम दिल से ही ज़्यादा होता है।
   तो चलिए इस ग़ज़लयात्रा में आज प्रस्तुत कर रही हूं 'दिल' से वाबस्ता कुछ चुनिंदा शेर और ग़ज़लें.....

दिल न होता तो कोई चीज़ न होती दुनिया 
दिल भी क्या चीज़ है दुनिया पे मिटा जाता है 
      ❤ - शफ़ी मंसूर

एक ही सी तन्हाई एक ही सा सन्नाटा 
दश्त क्या है दिल क्या है क्या तुझे बताऊँ मैं
   ❤ - जाफ़र शिराज़ी

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है 
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है 
  ❤ - मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है 
जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे 
   ❤ - अहमद फ़राज़

नुकताचीं है, ग़मे-दिल उसको सुनाये न बने
क्या बने बात, जहां बात बनाये न बने

मैं बुलाता तो हूं उसको, मगर ऐ जज़बा-ए-दिल
उस पे बन जाए कुछ ऐसी, कि बिन आये न बने
  ❤ - मिर्ज़ा ग़ालिब

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं 
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में 
  ❤ - बशीर बद्र

मोहब्बत रंग दे जाती है जब दिल दिल से मिलता है 
मगर मुश्किल तो ये है दिल बड़ी मुश्किल से मिलता है 
 ❤ - जलील मानिकपूरी

बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए 
दिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है 
 ❤ - हैदर अली आतिश

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें 
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में 
  ❤ - बहादुर शाह ज़फ़र

दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे 
जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे 
   ❤ - दाग़ देहलवी

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें 
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं 
    ❤ - साहिर लुधियानवी

दिल चीज़ क्या है आप मिरी जान लीजिए 
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए 
  ❤ - शहरयार

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास 
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं 
 ❤ - फ़िराक़ गोरखपुरी

दर्द हो दिल में तो दवा कीजे 
और जो दिल ही न हो तो क्या कीजे 
 ❤ - मंज़र लखनवी

दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं 
लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं 
 ❤ - क़तील शिफ़ाई

कभी दिल में आरज़ू-सा, कभी मुँह में बद्दुआ-सा
मुझे जिस तरह भी चाहा, मैं उसी तरह रहा हूँ

मेरे दिल पे हाथ रक्खो, मेरी बेबसी को समझो
मैं इधर से बन रहा हूँ, मैं इधर से ढह रहा हूँ
    ❤ - दुष्यंत कुमार

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।
       ❤ - अदम गोंडवी

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं
     ❤ - राजेश रेड्डी

ज़ज़्बात के बिन, ग़ज़ल हो गयी क्या
बिना दिल के पिघले, ग़ज़ल हो गयी क्या

नहीं कोई मक़सद, नहीं सिलसिला है
बिना बात के ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

नहीं कोई कासिद, नहीं कोई चिठिया
बिना कुछ लिखे ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

जरूरत के पाबन्द हैं, लोग अब तो
बिना दिल मिले ही, ग़ज़ल हो गयी क्या
 ❤ -  डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक

खोल दें हम अपने दिल की डायरी।
फिर करें कुछ कच्ची-पक्की शायरी।

बोझ लें हम क्यूं भला, हर बात का
ज़िंदगी झिलमिल करें ज्यों फुलझरी।

आलमारी  में  रखे  कुछ  शब्द  ढूंढे
फिर  करें  बातों  में  कुछ  कारीगरी।

बोतलों  के  जिन्न-सी  हर  दुश्मनी
भूल सब आओ करें कुछ मसखरी।

कह रही सब से 'शरद', तुम भी सुनो
दिल की ख़ातिर भी रखो कुछ बेहतरी।
   ❤ - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मेरी यादों में आके क्या करोगे
आस दिल में जगा के क्या करोगे

ज़माने का बड़ा छोटा सा दिल है
सबसे मिल के मिला के क्या करोगे

अगर राहों में ही वीरानियाँ हों
इतनी बातें बना के क्या करोगे

नफरतें और बढ़ जाएंगी दिल में
ऐसी बातों में आ के क्या करोगे

जो दिल नाआशना ही हो चुके हों
फ़क़त रिश्ता बना के क्या करोगे
  ❤ - शाहनवाज़ 'साहिल'

दर्दे दिल की लौ ने रौशन कर दिया सारा जहां  
इक अंधेरे में चमक उट्ठी कि जैसे बिजलियां
   ❤ - देवी नागरानी

ए मेरे दिल तुझे हुआ क्या है 
बस सुबह से बुझा बुझा सा है ।

क्या किसी ने तुझे कहा कुछ है 
पर किसी ने तुझे कहा क्या है । 
   ❤ - सुधेश

हवा पानी नही मिलता वो पत्ते सूख जाते हैं
लचीले हो नही सकते शजर वो टूट जाते हैं

मुझे आता नही यारों ज़माने का चलन कुछ भी
वो मेरी बात पे गुस्से में अक्सर रूठ जाते हैं

गुज़रती उम्र का होने लगा है कुछ असर मुझपे
जो अच्छे शेर होते हैं वो अक्सर छूट जाते हैं

अतिथि देव भव अच्छा बहुत सिद्धांत है लेकिन
अतिथि बन के आए जो मुसाफिर लूट जाते हैं

न खोलो तुम पुरानी याद के ताबूत को फिर से
कई लम्हे निकल के पेड़ पे फिर झूल जाते हैं

हमारे दिल के दरवाजे पे तुम दस्तक नही देना
पुराने घाव हल्की चोट से ही फूट जाते हैं
    ❤ - दिगंबर नासवा

दिवाली थी तो चरागों का एहतराम किया,
दिल अपने जलाए और तेरे नाम किया।
   ❤ - नीतिश तिवारी

फेसबुक  से  यूँ   हटाना  बस में था ।
अब जरा  दिल  से हटाकर  देखिये ।।

आप मेरे  इश्क़  के  काबिल तो  हैं ।
हो सके तो  दिल  मिलाकर देखिये ।।

दीन  हो  जाए   न  ये  बर्बाद  अब ।
मत  हमें  नज़रें  झुकाकर  देखिये ।।

कत्ल   होने   का  इरादा  था  मेरा ।
बेवजह  मत  आजमाकर  देखिये ।।

धड़कने   देंगी  गवाही  फ़िक्र   की ।
खत मेरा दिल से लगाकर  देखिये ।।
     ❤ - नवीन मणि त्रिपाठी

चाहता तो वह मुझे दिल में भी रख सकता था
मुनासिब हरेक को चार दीवारियाँ नहीं होती

कुछ तो होता होगा असर दुआओं का भी
सिर्फ दवाओं से ठीक बीमारियाँ नहीं होती
   ❤ - कविता रावत
   
अपना मक़ाम दिल के तेरे बीचो बीच था
मुश्क़िल हमें था जाना वहाँ तक मगर गए

हो उस निगाहे लुत्फ़ की तारीफ़ किस तरह
जिसकी बिनाहे शौक नज़ारे सँवर गए

जाँबर सभी थे जान बचाकर लिए निकल
हम ही थे इक जो तेरी अदाओं पे मर गए

तो फिर नहीं बुलाएँगे ता’उम्र आपको
ग़ाफ़िल जी आप दिल से हमारे अगर गए
  ❤ -  चन्द्र भूषण मिश्र ग़ाफ़िल


तुझे चाहना, तुझे सोचना अच्छा  लगता है, 
मात्र कल्पनाओं में मिलना अच्छा लगता है!! 

बंद आँख से स्वप्न मिलन के प्रायः हैं देखे,
खुली पलक से तेरा सपना अच्छा  लगता है!! 

देखा नहीं तुझे है अब तक फिर भी जाने क्यों, 
तेरा नाम जुबां पे रखना अच्छा लगता है!!

अपने गीतों में, कविता में क्यों न तुझे ढालूँ, 
ग़ज़ल बनाकर दिल पर लिखना अच्छा लगता है!!

हर धड़कन में तू शामिल है, प्रेम रतन धन तू,  
"तू है मात्र हमारी" कहना, अच्छा लगता है..!! 

तेरे साथ बैठ कर सागर तट पर रातों में, 
उठती गिरती लहरें गिनना अच्छा लगता है..!! 

कुछ अपने कुछ तेरे मन की बातें कानों में,
धीरे-धीरे कहना सुनना अच्छा लगता है..!!
   ❤ - विद्या भूषण मिश्र " भूषण"


और अंत में प्रस्तुत है मेरी यानी इस ब्लॉग लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की एक ग़ज़ल -

चले थे साथ, अब राहें अलग अपनी जुदा क्यों हैं ।
नहीं दिल की कोई ग़लती तो पाता ये सज़ा क्यों है।

मुहब्बत के  जुनू वाली  ये  बातें  तो  पुरानी  हैं
ये तूफां-सा मगर सीने में आखि़र अब उठा क्यों हैं।

कोई  आवाज़ देता है  किसी को़,  चौंकती हूं  मैं
पुकारा है  मुझे उसने  ये  धोखा-सा हुआ क्यों है।

न जाने कब से उसने तो अलग दुनिया बसा ली है
मेरे दिल के मकां में वो अभी तक यूं बसा क्यों है।

वो ग़म में है, रहे, मुझको भला क्यों फि़क्र हो उसकी
मेरी आंखों से आंसू का ये  दरिया-सा बहा क्यों है।

बिना बरसे ही रह जाना लिखा किस्मत में है इसकी
कोई बतलाए आखिर ये  उठी ‘वर्षा’, घटा  क्यों है।
           ❤ - डॉ वर्षा सिंह

World Heart Day, Ghazal Yatra