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शुक्रवार, नवंबर 27, 2020

कहां आ गए | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

ग़ज़ल


कहां आ गए

- डॉ. वर्षा सिंह


हम कहां से चले थे कहां आ गए 

सोचिए तो जरा दर्द क्यों भा गए 


बूंद बरसी न फूलों लदी डालियां

फूल खिलने से पहले ही मुरझा गए 


लोग फसलें उगाने चले रेत में 

खेत में तो बबूलों के दिन आ गए


उनसे उम्मीद थी कुछ कहेंगे नया 

बात मेरी वही आज दोहरा गए


आंधियां दहशतों की चलीं इस कदर 

त्रास के मेघ काले घने छा गए 


अब कहां है वो 'चाणक्य' जो ज्ञान दे

'नंद' विजयी हुआ, मात हम खा गए


पूजिए पूजना है जिसे आपको 

हम तो "वर्षा" ज़माने से उकता गए


#ग़ज़लवर्षा #ग़ज़ल #कहां_आ_गए


शुक्रवार, नवंबर 20, 2020

अपना दोष यही | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

अपना दोष यही

         - डॉ. वर्षा सिंह

सच की मूरत ढाली, अपना दोष यही
गढ़ी न सूरत जाली, अपना दोष यही

न्यायालय से न्याय न वर्षों मिल पाया
जेबें अपनी खाली, अपना दोष यही

हंसी-ठिठोली के मंचों से दूर रही
ग़ज़ल व्यथाओं वाली, अपना दोष यही

कैसे दिन को रात कहें, रातों को दिन
दुनिया देखी-भाली, अपना दोष यही

एक हाथ से कभी किसी भी अवसर पर
बजा ना पाए ताली, अपना दोष यही

युग के रंजीत परिधानों से दूर सदा
ओढ़ी "कमली-काली" अपना दोष यही

खर-पतवार भरे खेतों की बाहों में
ढूंढी जौ की बाली, अपना दोष यही

सपनों की भी मृगमरीचिका क्या कहिए
आयु व्यर्थ खो डाली, अपना दोष यही

अपनी विपदाएं ही "वर्षा" क्या कम थीं
जग की विपदा पाली, अपना दोष यही

         ----------------

#ग़ज़ल #दोष #कमली #ग़ज़लवर्षा #मृृृगमरीचिका

गुरुवार, नवंबर 12, 2020

दीप का त्यौहार है दीपावली | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

        दीप का त्यौहार है दीपावली
                              - डॉ. वर्षा सिंह
दीप का त्यौहार है दीपावली
शीत का श्रृंगार है दीपावली

रह न पाए मैल मन में रंच भर
ज्योति की जलधार है दीपावली

मावसी पीड़ा मिटाने आ गई
हर्ष की झंकार है दीपावली

रह न जाए स्वप्न कोई भी अधूरा
कुमकुमी उपहार है दीपावली

दूर हमसे हो बुराई की डगर
शुभ-पलों का द्वार है दीपावली

आपसी मतभेद सारे भूलिए
प्रीत की मनुहार है दीपावली

हो रही आलोक "वर्षा" हर तरफ़
तिमिर का प्रतिकार है दीपावली
            ---------------- 
#दीपावली #ग़ज़ल #ज्योति

रविवार, सितंबर 20, 2020

ज़िन्दगी है ग़ज़ल | ग़ज़ल को समर्पित ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज इस "ग़ज़लयात्रा" में प्रस्तुत है ग़ज़ल को ही समर्पित मेरी यह ग़ज़ल .... 

ज़िन्दगी है ग़ज़ल
         - डॉ. वर्षा सिंह

स्याह रातों में इक रोशनी है ग़ज़ल
धूप में छांह बन कर मिली है ग़ज़ल

भिन्न मिसरे बंधे एक ही डोर से
एकता की अनोखी लड़ी है ग़ज़ल

फ़ासलों में दिलासा दिलाती है ये
वस्ल की वादियों में नदी है ग़ज़ल

दिल के बहलाव का सिर्फ़ सामान है
तो किसी के लिए ज़िन्दगी है ग़ज़ल

क़ाफ़ियों से रदीफ़ों की है दोस्ती
हर बहर में संवर कर सजी है ग़ज़ल

दर्द-दुख है, समस्या ज़माने की है
लोग कहते इसे ये नयी है ग़ज़ल

धर्म की, जाति की बेड़ियों से परे
हर ज़ुबां को ये अपनी लगी है ग़ज़ल

वक़्त के साथ हरदम बदलती रही
वक़्त की नब्ज़ की डायरी है ग़ज़ल

तंज़ बन कर हुकूमत की आंखों चुभी
इश्क़ बन आंधियों में पली है ग़ज़ल

खुरदुरे रास्तों को लगाती गले
रेशमी ख़्वाब ले कर चली है ग़ज़ल

ज़ुल्म का सामना डट के करती रही
बेबसी में सहारा बनी है ग़ज़ल

घुंघरुओं की है रुनझुन सुनाती कभी
पीर-दरगाह में नात भी है ग़ज़ल

ये है क़ुर्बानियों की अजब दास्तां
हीर है तो कभी, सोहनी है ग़ज़ल

दी जो आवाज़ "बिस्मिल", भगत सिंह ने
बांध सिर पर कफ़न फिर उठी है ग़ज़ल

अब वो पहले सी सीमित नहीं जाम में
अब हक़ीक़त के दर पर खड़ी है ग़ज़ल

साज संतूर हो, या कि हो बांसुरी
दिल की घड़कन में हरदम बजी है ग़ज़ल

हाशिए में खड़े आमजन के लिए
अब तो बेशक मसीहा बनी है ग़ज़ल

महफ़िलों से निकल कर गली-गांव में
खेत-चौपाल में आ गयी है ग़ज़ल

बूढ़े मां बाप की फ़िक्र है गर इसे
खिलखिलाती सी नन्हीं परी है ग़ज़ल

फ़ारसी, अरबी, उर्दू से हिन्दी हुई
अब बुंदेली के रंग में  रंगी  है ग़ज़ल

मीर, ग़ालिब से दुष्यंत के बाद तक
आज "वर्षा" के दिल में बसी है ग़ज़ल

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प्रिय मित्रों, ग़ज़ल को समर्पित मेरी ग़ज़ल "ज़िन्दगी है ग़ज़ल" आज दिनांक 20.09.2020 को वेब मैगज़ीन "युवाप्रवर्तक" में प्रकाशित हुई है। 
हार्दिक आभार युवाप्रवर्तक 🙏💐🙏
Link  

#युवाप्रवर्तक #ग़ज़ल #ज़िन्दगी #ग़ज़लवर्षा

रविवार, जुलाई 26, 2020

चांद | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों, मेरे ग़ज़ल संग्रह "हम जहां पर हैं" में संग्रहीत एक और ग़ज़ल प्रस्तुत है....
चांद
     - डॉ. वर्षा सिंह

यादों से भी गहरा चांद
पिघले कतरा-कतरा चांद

परदेसी सा आता जाता
नीम गांछ पर ठहरा चांद

प्रियतम का ख़त पूरनमासी
अक्षर -अक्षर उतरा चांद

धार बेतवा की दर्पण-सी
देखी अपना चेहरा चांद

झील नहाए पर्वत सोए
रोशन ज़र्रा- ज़र्रा चांद

हरियाला बन्ना विंध्याचल
माथे सोहे चेहरा चांद

रात के काले लंबे गेसू
किसने बांधा गजरा चांद

फ़ुरकत के बेबस लम्हों में
इश्क़ परिन्दा, पिंजरा चांद

तन्हाई का आलम 'वर्षा'
ग़ज़ल चांदनी मिसरा चांद
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#ग़ज़लवर्षा #dr_varsha_singh
#हम_जहां_पर_हैं #ग़ज़ल #सागर #पर्वत #ख़त #चांद #बेतवा #विन्ध्याचल #परिन्दा #पिंजरा #झील #बन्ना #परदेसी
#दर्पण #तन्हाई #अक्षर #पूरनमासी

मंगलवार, जुलाई 21, 2020

इक चांद है इस खत में | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों मेरे ग़ज़ल संग्रह "हम जहां पर हैं" में संग्रहीत एक ग़ज़ल प्रस्तुत है....
ग़ज़ल
इक चांद है इस खत में
         - डॉ. वर्षा सिंह

भूली हुई गजलों को जब सांझ कोई गाए।
मन दौड़ के बीते दिन मुट्ठी में उठा लाए।

खिड़की में हरे शीशे लगवा भी लिए तो क्या !
जंगल तो नहीं आकर बाहों में समा पाए।

संकेत के झुरमुट में तुम झांक के देखो तो,
संवाद कोई खिलता शायद तुम्हें दिख जाए।

लावे की नदी बनकर चिंताएं उफनती हैं,
जलते हैं गुलाबी पल दिखते ही नहीं साए।

इक चांद है इस ख़त में, तुम पढ़ के बताना ये,
तुमको भी उजालों के, सपने तो नहीं आए।

हर सांस में आस बंधी, है सुख के संदेशे की,
कोई तो कभी आए और हाल सुना जाए।

"वर्षा" का हृदय निश्छल, ये हाल है चाहत का,
सागर भी भला लागे, पर्वत भी उसे भाए।
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#ग़ज़लवर्षा #dr_varsha_singh
#हम_जहां_पर_हैं #ग़ज़ल #इक_चांद_है_इस_ख़त_में #सागर #पर्वत #ख़त #खिडक़ी #संकेत #संवाद

रविवार, जुलाई 19, 2020

और तुम ख़ामोश हो | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज एक और ग़ज़ल मेरे संग्रह "हम जहां पर हैं" से....
   ... और तुम ख़ामोश हो !
                        - डॉ. वर्षा सिंह             
हो रही आहत मनुजता, और तुम ख़ामोश हो।
पैंतरों से  लैस  प्रभुता, और तुम  ख़ामोश हो।

वृद्ध, रोगी हैं, अपाहिज कोशिशों के काफ़िले,
दर्द का सैलाब उठता, और तुम खामोश हो ।

खौलते जल में गिरी हो जिस तरह मछली कोई,
ख़्वाब आंखों में तड़पता, और तुम ख़ामोश हो।

बुद्धिजीवी हो रहे असमर्थ, कैसे क्या हुआ !
प्रश्न का उत्तर न मिलता, और तुम ख़ामोश हो।

वायदे सारे नपुंसक, राहतें जन्मीं नहीं,
पैरवी खुद साक्ष्य करता, और तुम ख़ामोश हो।

लाल, पीली, बैंगनी  झंडी  उठाए  हाथ में,
दिनदहाड़े झूठ छलता, और तुम ख़ामोश हो।

हो रही 'वर्षा', घिरी है  यातनाओं की घटा,
जल नदी का है उफनता, और तुम ख़ामोश हो।
          ----------------------

#ग़ज़लवर्षा #dr_varsha_singh
#हम_जहां_पर_हैं #ग़ज़ल #और_तुम_ख़ामोश_हो #बुद्धिजीवी #दर्द #ख़्वाब

शुक्रवार, जुलाई 17, 2020

प्यार की भाषा | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
     
         प्रिय ब्लॉग पाठकों, मेरी यह ग़ज़ल मेरे संग्रह "हम जहां पर हैं" में संग्रहीत है। यह पुरानी ग़ज़ल मुझे लगता है कि आज के हालात में भी आपको ताज़ा-सी महसूस होगी। निवेदन है कि कृपया पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। धन्यवाद !

ग़ज़ल

प्यार की भाषा
        -डॉ. वर्षा सिंह

वह समझ पाते नहीं घर - बार की भाषा।
सीख जो पाते नहीं हैं प्यार की भाषा।

शर्तिया मंझधार में वह नाव डूबेगी,
हो गई विपरीत गर पतवार की भाषा

जी-हज़ूरी, वाहवाही की सदा चाहत,
इसलिए चुभती उन्हें अख़बार की भाषा

और कुछ इतिहास द्वापर का लिखा जाता,
गर भुला देते सभी प्रतिकार की भाषा।

दोस्ती जिसने क़लम के साथ कर ली हो,
रास कब आई उसे तलवार की भाषा ।

गांव में दाख़िल हुई जिस दिन हवा शहरी,
लोग भूले झांझरी झंकार की भाषा ।

बाद मरने के वही अर्थी, वही मरघट ,
काम तब आती नहीं अधिकार की भाषा।

ज़िंदगी की दौड़ में वह रह गया पीछे,
पढ़ न पाया जो यहां रफ्तार की भाषा।

नफ़रतों का तब नहीं होता निशां 'वर्षा',
काश, होती एक गर संसार की भाषा।
             -----------

#ग़ज़लवर्षा #dr_varsha_singh
#हम_जहां_पर_हैं #ग़ज़ल #संसार #अख़बार #प्यार #भाषा

गुरुवार, मई 28, 2020

ग़ज़ल | वक़्त गुज़र जाता है | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

ग़ज़ल

वक़्त गुज़र जाता है
            - डॉ. वर्षा सिंह

यादें बाकी रह जाती हैं, वक़्त गुज़र जाता है।
जिसे भूलना चाहो अक्सर, वही नज़र आता है।

जीवन की यह नदी डूब कर, पार इसे करना है,
मन में जिसके संशय हो वह, नहीं उबर पाता है।

अहसासों की दहलीज़ों को, साफ़ करो फिर देखो,
हर पल अपने साथ हमेशा, नई ख़बर लाता है।

दर्द ज़माने भर का जिसने, पाल लिया हो  दिल में,
इसमें दो मत नहीं वही तो, गीत मधुर गाता है।

सूरज का दिन से है जैसा, चंदा का रातों से
"वर्षा" का बादल से वैसा ही बेहतर नाता है।

           ---------------

    मेरी यह ग़ज़ल आज web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 29.05.2020 में प्रकाशित हुई है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=33828



गुरुवार, मई 14, 2020

🤔 घर वापसी करते प्रवासी श्रमिकों की व्यथा-कथा को समर्पित | ग़ज़ल | दर -दर की ठोकर लिक्खी है | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

घर वापसी करते प्रवासी श्रमिकों की व्यथा-कथा को समर्पित एक ग़ज़ल

दर -दर की ठोकर लिक्खी है
           - डॉ. वर्षा सिंह

कांधे पर है बोझ गृहस्थी का पांवों में छाले हैं।
दर -दर की ठोकर लिक्खी है, खोटी क़िस्मत वाले हैं।

गांव, गली, घर छोड़ा था सब, पैसे चार कमाने को,
अब जाना ये महानगर भी दिल के कितने काले हैं।

भूख-प्यास से बढ़ कर भैया, नहीं बिमारी कोई है,
क़दम-क़दम भुखमरी-ग़रीबी, यहां सैकड़ों ताले हैं।

अम्मा, बाबू, चंदा, बुधिया, गुड्डू, मुन्नी, रामकली
एक मजूरी के बलबूते कितने प्राणी पाले हैं।

दर्ज़ रहेंगे तारीखों में "वर्षा" मुश्किल वाले दिन,
अगर न टूटी सांस कहेंगे- 'दुर्दिन देखे-भाले हैं।'

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आज web magazine युवाप्रवर्तक दि. 14.05.2020 में मेरी यह ग़ज़ल "दर -दर की ठोकर लिक्खी है" प्रकाशित हुई है...
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏



मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
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मंगलवार, अप्रैल 07, 2020

लॉकडाउन संदर्भित ग़ज़ल..... तालाबंदी के आलम में - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

     प्रस्तुत है लॉकडाउन संदर्भित मेरी ताज़ा ग़ज़ल ....

लॉकडाउन संदर्भित ग़ज़ल

तालाबंदी के आलम में
         - डॉ. वर्षा सिंह

कट जाएंगे बेशक ये भी, बेहद मुश्किल वाले दिन।
तालाबंदी के आलम में, लगते भोले-भाले दिन।

ग़ैरज़रूरी आपाधापी, कहीं दुबक कर बैठ गई,
लम्हा-लम्हा कछुए जैसे सरके ढीले-ढाले दिन।

बस्ते एक तरफ रख्खे हैं, ऑनस्क्रीन पढ़ाई है,
कुछ भी कह लो लेकिन ये हैं बच्चों के रखवाले दिन।

वक़्त सुरक्षित दूरी का है, नज़दीकी से ख़तरा है,
दिल को रखना साफ़ हमेशा, ढल जाएंगे काले दिन।

सावधान रहना ही होगा जगज़ाहिर इस आफ़त से,
बन जाएं नासूर कहीं ना बढ़ते-बढ़ते छाले दिन।

यदाकदा घटना घट जाती, नियमों के उल्लंघन की
इंसानी फ़ितरत के आगे मुज़रिम बैठे-ठाले दिन।

ये भी तय है कठिन दौर कुछ सीख नई दे जाता है
भूल न पायेंगे जीवन भर, सुआ सरीखे पाले दिन।

फ़ुर्सत के लम्हात ये सोचो, बाद मिले हैं बचपन के,
याद आते हैं सोते-जगते "वर्षा" देखे-भाले दिन।
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 मेरी यह ग़ज़ल आज web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 07.04.2020 में  प्रकाशित हुई है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
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#ग़ज़लवर्षा #युवाप्रवर्तक
#लॉकडाउन #कोरोना #दिन


शुक्रवार, मार्च 20, 2020

Dr. Varsha Singh


    विश्व गौरैया दिवस पर विशेष ग़ज़ल

       चिड़िया
                - डॉ. वर्षा सिंह
   
अब घर की मुंडेरों पर, दिखती ही नहीं चिड़िया।
पंखों में खुशी भर कर, उड़ती ही नहीं चिड़िया।

स्वारथ की कुल्हाड़ी ने  जंगल को मिटा डाला
विश्वास के दानों को, चुगती ही नहीं चिड़िया।

तिनका भी नहीं मिलता, अब नीड़ बनाने को
सपनों की उड़ानें भी भरती ही नहीं चिड़िया।

ध्वनियां  हैं बहुत सारी, बेचैन  हवाओं में
फूलों से  नई बातें करती ही नहीं चिड़िया।

दुबकी है कहीं जा कर, अनजान ठिकाने में
‘वर्षा’ के इशारे भी पढ़ती ही नहीं चिड़िया।

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#ग़ज़लवर्षा
#ghazal_varsha


   आज विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 20 मार्च 2020 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
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मंगलवार, मार्च 17, 2020

ग़ज़ल... जंग छिड़ी है कुर्सी की - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

     समसामयिक घटनाक्रमों ... वर्तमान हालातों पर आज मेरी ताज़ा ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 17 मार्च 2020 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=26639

ग़ज़ल

जंग छिड़ी है कुर्सी की
            -डॉ. वर्षा सिंह

निष्ठा पर भी दाम लगे बाज़ारों में
चमक नहीं अब शेष चुनावी नारों में

जनता की आवाज़ सुनाई दे कैसे
शोर बहुत है सत्ता के गलियारों में
         
रंगमंच पर अभी यवनिका पतन कहां!
जोश बहुत है बेशक नाटककारों में

धराशायी करने की तिकड़म जारी है
जंग छिड़ी है कुर्सी की अब यारों में

स्वार्थसिद्ध करने को ही चमकीं अक्सर
बहुत धार है जंग लगी तलवारों में

शब्द लांछित हों गर कहने-सुनने से
कर लेना कुछ बातें ज़रा इशारों में

मझधारों में नाव उलटने की साज़िश
होड़ लगी है "वर्षा" यहां किनारों में
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#ग़ज़लवर्षा
#युवाप्रवर्तक


रविवार, मार्च 15, 2020

ग़ज़ल ... अगले पल का पता नहीं - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

ग़ज़ल
        - डॉ. वर्षा सिंह

अगले पल का पता नहीं फिर लफड़ा क्यों ?
सबसे ख़ुद को साबित करना तगड़ा क्यों ?

गली, मुहल्ला, शहर सभी हैं एक अगर
हम दोनों के बीच आपसी झगड़ा क्यों ?

माना टकराहट है कहीं विचारों में
तो भी आखिर मार-कुटौव्वल पचड़ा क्यों ?

अच्छे कपड़ों में सज कर कब सोचा है !
पत्थर तोड़ रही वह पहने चिथड़ा क्यों ?

मुस्काते चेहरों वाली इस महफ़िल में
पता नहीं "वर्षा" ने रोया दुखड़ा क्यों ?

              --------///--------

      मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 28 फरवरी 2020 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
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#ग़ज़लवर्षा
#ghazal_varsha
#युवाप्रवर्तक


ग़ज़ल ... उसे देखा नहीं - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

उसे देखा नहीं, अरसा हुआ है.
वो मुझसे बेवज़ह रूठा हुआ है

हरा जो बाग़ दिखता काग़ज़ों पर
हक़ीक़त में मगर उजड़ा हुआ है

लगे हैं क्लोज सर्किट राजपथ में
गली में रेप बच्ची का हुआ है

उसे भ्रम है कि दुनिया जानती है
इसी भ्रमजाल में जकड़ा हुआ है

हुए दिन- रात के चौबीस घंटे
शहर में क्या कहें, क्या-क्या हुआ है

बढ़ी है क़द्र मेरी परिचितों में
मेरा दीवान इक शाया हुआ है

दिनों के बाद अब  "वर्षा" हुई है
चलो, कुछ तो कहीं अच्छा हुआ है
        --------/-------

#ग़ज़लवर्षा
#ghazal_varsha

      मेरी इस ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 27 फरवरी 2020 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
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सोमवार, जनवरी 20, 2020

ग़ज़ल.... अजब तमाशा देखा मैंने - डॉ. वर्षा सिंह



Dr. Varsha Singh

ग़ज़ल

अजब तमाशा देखा मैंने
       - डॉ. वर्षा सिंह

मैंने अपनी बात कही थी, उसने अपनी समझी बात
तब से वह करता है मेरी, मैं करती हूं उसकी बात

अजब तमाशा देखा मैंने, दुनिया के इस मेले में
जिसके जी में जो आता है करता बहकी- बहकी बात

धोखे से भी मत कह  देना, प्यार-मुहब्बत का किस्सा
वरना दूर तलक जाएगी मुंह से जो भी निकली बात

क़ैद ज़िन्दगी के कुछ लम्हे, एल्बम की तस्वीरों में
याद आएगी कभी किसी दिन, बेशक भूली-बिसरी बात


कभी किसी मौके पर "वर्षा" चुप रह जाना ग़लत नहीं
ख़ुशियों की गर कर न सको तो मत करना तुम ग़म की बात

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गुरुवार, दिसंबर 26, 2019

ग़ज़ल ... मर्ज़ी क्या -डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh
समझौता मेरे ही ज़िम्मे, नहीं तुम्हारा कुछ भी क्या
माफ़ी मैं ही मांगूं आख़िर मेरी ऐसी ग़लती क्या

हुईं क़िताबें कम तो भारी सूचनाओं का बोझ बढ़ा
सारा बचपन हवा हो गया, बच्चे भूले मस्ती क्या

यादों का संसार तिलस्मी, यादों के साये लम्बे
यादें तो यादें होती हैं मीठी क्या और खट्टी क्या

माना जीवन भर की खुशियां नहीं तुम्हारे वश में हैं
लेकिन मिलने पर भी आख़िर दोगे न इक झप्पी क्या

एक से बढ़ कर एक तमाशा किया सियासतदानों ने
रहे सलामत कुर्सी चाहे रिश्तों की हो कुर्की क्या

मनमानी कर तुमने अपने नियम-क़ायदे गढ़ डाले
एक दफ़ा तो पूछा होता "वर्षा" तेरी मर्ज़ी क्या
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मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 27 दिसम्बर 2019 में स्थान मिला है। युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏 मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ... http://yuvapravartak.com/?p=23459

शनिवार, अक्टूबर 12, 2019

ग़ज़ल .... शरद पूर्णिमा - डॉ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh

*शरद पूर्णिमा दिनांक 13.10.2019 पर विशेष*

*ग़ज़ल*
                 *शरद पूर्णिमा*
                                - डॉ. वर्षा सिंह

क्या क़यामत ढा रही, है शरद की पूर्णिमा।
गीत उजले गा रही, है शरद की पूर्णिमा।

भेद करती है नहीं धनवान - निर्धन में ज़रा
पास सबके जा रही, है शरद की पूर्णिमा।

दूध की उजली कटोरी या बताशे की डली
याद मां की ला रही, है शरद की पूर्णिमा।

दस्तकें देने नयी फिर कार्तिक के द्वार पर
बन संवर कर आ रही, हैै शरद की पूर्णिमा।

खोलती किरणें कई गोपन प्रकृति के अनकहे
नभ- धरा पर छा रही, है शरद की पूर्णिमा।

यूं तो पूरे चांद वाली रात लगती है भली
आज बेहद भा रही, हैै शरद की पूर्णिमा।

हो रही "वर्षा" सुधा की, चांदनी के रूप में
मधु कलश छलका रही, है शरद की पूर्णिमा।
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        आज शरद पूर्णिमा के अवसर पर मेरी इस ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 13 अक्टूबर 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
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ग़ज़ल ... शरद पूर्णिमा - डॉ. वर्षा सिंह


मंगलवार, अक्टूबर 08, 2019

ग़ज़ल .... दशहरा का दिन - डॉ. वर्षा सिंह

Happy Dussehra

            🚩🏵 🔴  शुभ दशहरा 🔴🏵 🚩
*विजयादशमी पर विशेष*
*ग़ज़ल*

*दशहरा का दिन*

                 - डॉ. वर्षा सिंह

यूं सत्य की असत्य पर विजय सदा बनी रहे।
दशहरा का दिन सभी से आज बस यही कहे।

बुराइयों का अंत हो, स्वच्छ सारा तंत्र हो
एक व्यक्ति भी यहां दमन कतई नहीं सहे।

सभी में राम रह रहे, यही तो जानना है,बस
जला दे रावणों को जो, अग्निधार वह बहे।

न हो सिया का अपहरण, न हों शिला में स्त्रियां
हरेक बेटी अब यहां भुजाओं में गगन गहे।

रहे न भ्रष्ट आचरण, रहे यूं सदविचार ही
'वर्षा' प्रार्थना का ये,   दीप इक सदा दहे।

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             🚩🏵 🔴  शुभ दशहरा 🔴🏵 🚩

       मेरी इस ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 08 अक्टूबर 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
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सोमवार, सितंबर 30, 2019

ग़ज़ल ... ग़ज़ल जब बात करती है - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       मेरी इस ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 30 सितम्बर 2019 में स्थान मिला है।
विशेष बात यह है कि मेरी यह ग़ज़ल मेरे प्रकाशनाधीन आगामी गजल संग्रह की शीर्षक ग़ज़ल है। जी हां, मेरे प्रकाशनाधीन ग़ज़ल संग्रह का शीर्षक है - "ग़ज़ल जब बात करती है"
      मित्रों, यदि आप चाहें तो मेरी इस ग़ज़ल को इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
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युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏

ग़ज़ल

ग़ज़ल जब बात करती है
          - डॉ. वर्षा सिंह

ग़ज़ल जब बात करती है, दिलों के द्वार खुलते हैं
ग़मों की स्याह रातों में खुशी के दीप जलते हैं

सुलझते हैं कई मसले, मधुर संवाद करने से
भुलाकर दुश्मनी मिलने के फिर पैगाम मिलते हैं

जहां हो राम का मंदिर, वहीं अल्लाह का घर हो
यक़ीं मानो, तभी चैनो-अमन के फूल खिलते हैं

उठायी हो शपथ जिसने मनुजता को बचाने की
उसी के पांव मंज़िल की तरफ़ दिन-रात चलते हैं

समझना चाहिए यह सच, हमारे हर पड़ोसी को
जो टालो शांति से टकराव भी चुपचाप टलते हैं

मिटा कर जंगलों को, ताप धरती का बढ़ा डाला
ध्रुवों पर ग्लेशियर भी आज तेजी से पिघलते हैं

बुझेगी प्यास फिर कैसे, जो पानी न सहेजेंगे
 बिना 'वर्षा' कई जंगल मरुस्थल में बदलते हैं
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ग़ज़ल - डॉ. वर्षा सिंह