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Dr. Varsha Singh |
नदी और शायरी का गठजोड़ निराला है। कितने ही रंगों में, कितने ही रूपों में नदी ने शायरी में अपनी जगह बनाई है।
किसी शायर ने कहा है-
नदी जब किनारा छोड़ देती है।
राह की चट्टान तक तोड़ देती है।
बात छोटी सी अगर चुभ जाती है दिल में ज़िंदगी के रास्तों को मोड़ देती है।
मासूम तख़ल्लुस से शायरी करने वाले शायर कहते हैं-
मैं नदी हूँ तुम किनारे का नाम हो।
मैं तुम्हारे कारण हूँ तुम मेरा परिणाम हो ।
.... और शायर राजीव सिंह का मतले का यह शेर देखें-
समंदर से प्यार करना कोई नदी छोड़ पाती नहीं।
रेगिस्तां की तरफ भूलकर भी कभी वो जाती नहीं ।
नदी पर बात करते हुए प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करने में सक्षम ये शेर नामालूम शायर के हैं-
नदी को सागर से मिलने से ना रोको।
बारिश की बूंदों को धरती से मिलने से ना रोको।
जिन्दा रहने के लिए तुमको देखना जरुरी है,
मुझे तुम्हारा दीदार करने से ना रोको।
शायर आलोक श्रीवास्तव नदी का साथ देते हुए असमंजस में दिखाई देते हैं-
ज़रा पाने की चाहत में बहुत कुछ छूट जाता है।
नदी का साथ देता हूं, समंदर रूठ जाता है।
गुलज़ार ने कुछ इस तरह नदी का इस्तेमाल अपनी शायरी में किया है-
मैंने समय से रोक के
तेरा पता पूछा है।
नीली नदी से कह के
सागर तले ढूंढा है।
दुष्यंत कुमार का यह चर्चित शेर देखें-
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है। नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
डॉ राकेश जोशी के चिंतन में नदी का दखल कुछ इह प्रकार है-
हर तरफ गहरी नदी है, क्या करें।
तैरना आता नहीं है, क्या करें ।
विजय गौतम इश्क़ का पर्याय नदी को मान कर कहते हैं-
इश्क़ इक नदी है , सो हम किनारे किनारे जाएंगे ।
तजुर्बा यही कह रहा है , बेमौत मारे जाएंगे।
बशीर बद्र की ग़ज़ल में नदी की उपस्थिति नायाब है-
जिसे ले गई है अभी हवा वो वरक़ था दिल की किताब का,
कहीं आँसुओं से मिटा हुआ कहीं आँसुओं से लिखा हुआ।
कई मील रेत को काट कर कोई मौज फूल खिला गई,
कोई पेड़ प्यास से मर रहा है नदी के पास खड़ा हुआ ।
मुनव्वर राणा कुछ इस अंदाज़ में नदी की बात कहते हैं-
नदी पहाड़ों से मैदान में तो आती है ।
मगर ये बर्फ़ पिघलने के बाद आती है।
वो नींद जो तेरी पलकों के ख़्वाब बुनती है
यहाँ तो धूप निकलने के बाद आती है।
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की ग़ज़ल में नदी का रूप ऐसा है -
होना है नदी और बहना है
पीड़ा को धार-धार सहना है
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह के कुछ और शेर देखें-
आंधियों का कल यहां पर ज़ोर था ।
हाथ में टूटे परों का छोर था ।
रात भर सोयी नही नीली नदी ,
बांसवन में अज़नबी सा शोर था।
कुमार विश्वास का नदी को ले कर अंदाज़े बयां कुछ ऐसा है-
“नदी पर्वत से उतरे तो मैं तेरी चाल लिखता हूं।
तेरे होठों की नरजिश पर हर एक सुर-ताल लिखता हूं।
तेरी आंखों की झीलों में है मेरे इश्क के आंसू,
तो जानेमन तेरे नाम ये भोपाल लिखता हूं।
अदम गोंडवी की बयानगी में भी नदी शामिल है-
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है।
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है।
सूर्यभानु गुप्त ने स्वयं को सुराही में कै़द नदी कह दिया है -
अपने घर में ही अजनबी की तरह।
मैं सुराही में इक नदी की तरह।
अपनी तनहाइयों में रखता है
मुझको इक शख़्स डायरी की तरह।
मेरी यानी डॉ. वर्षा सिंह की ग़ज़ल में नदी प्राणवान रूप में उपस्थित है-
नदी का दिल धड़कता है
सदा जलधार की ख़ातिर।
बरसते मेघ धरती पर
हमेशा प्यार की ख़ातिर।
मेरा यह शेर देखें-
मैं नदी गर बन गई तो क्या हुआ
कौन जो सागर बने मेरे लिये ।
और मेरी इस ग़ज़ल में नदी जंगल का अभिन्न अंग बन कर प्रस्तुत हुई है -
है दरख़्तों की शायरी जंगल ।
धूप-छाया की डायरी जंगल ।
हो न जंगल तो क्या करे कोई
चाँद-सूरज की रोशनी जंगल ।
बस्तियों से निकल के देखो तो
ज़िन्दगी की है ताज़गी जंगल ।
फूल, खुशबू, नदी की, झरनों की
पर्वतों की है बाँसुरी जंगल ।
नदी के प्रति मेरा स्नेह, मेरी चिंता मेरी ग़ज़ल में इस तरह मुखरित हुई है -
कट रहे जंगल हरीले, और हम ख़ामोश हैं।
हो रहे हैं होंठ नीले, और हम ख़ामोश हैं।
शेष यदि जंगल न होंगे सूख जाएगी नदी
चींखते ये शब्द सीले, और हम ख़ामोश हैं।
और अंत में मेरे यानी डॉ. वर्षा सिंह के ये शेर नदी को समर्पित हैं-
हर लहर पर पीर का पहरा हुआ।
अश्रु सागर और भी गहरा हुआ ।
उस नदी को नाम देना ज़िन्दगी ,
जिस नदी का जल लगे ठहरा हुआ।
बहुत सुंदर।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद गिरीश पंकज जी 🙏
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