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Dr. Varsha Singh |
यदि किसी की वास्तव में साहित्य सृजन में रुचि है और वह अपने आप को साहित्यकार मानता है तो समाज के प्रति उसका यह दायित्व बनता है कि वह जो भी साहित्य सर्जन करता है उसकी उपयोगिता समाज के लिए हो समाज से परे रहकर किया गया साहित्य सृजन किसी के भी काम नहीं आता है और वह निरर्थक ही माना जाएगा । सार्थक साहित्य वही है जो हमें सृजन करने पर आत्मीय सुख तो प्रदान करता ही है और साथ ही वह समाज के लिए उपयोगिता की वजह भी बनता है। गिरीश पंकज ऐसे रचनाकार हैं जो अनेक सामाजिक विषयों पर अनेक विधाओं में लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं। उनका लेखन समाजोपयोगी है।
जिस तरह पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया से जीवन को जारी रखने के लिए पोषक तत्वों का निर्माण होता है वैसे ही संवेदनाओं को जीवित रखने के लिए गिरीश पंकज की ग़ज़लों में निहित उत्प्रेरक तत्व प्रेरणा स्त्रोत का काम करते हैं। उनकी यह ग़ज़ल देखें, जिसमें सूर्य के प्रकाश सी ऊर्जा है-
जो लड़ने निकले हैं तम से
जीतेंगे वे अपने दम से
इस दुनिया क़ी रौनक होगी
आखिर तुमसे और कुछ हम से
कितने बड़े -बड़े ग़म सबके
मत घबरा तू अपने ग़म से
सुख का फंडा उसने जाना
काम चला लेता जो कम से
बदनामी वो सह न पाया
जां दे दी उफ़ लाज-शरम से
जो कहता है खून बहाओ
धर्म नही वो कहूँ कसम से
बात प्यार से बनती पंकज
कभी बनी न न गोली - बम से
जीवन के यथार्थ को रेखांकित करती गिरीश पंकज की ग़ज़लें कथ्य और शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं। भौतिक सुखों को सर्वोपरि मानने वाले अहंकारी व्यक्तियों को ललकारते हुए वे कहते हैं -
दौलत- फौलत, शोहरत-गद्दी इस पर क्या इतराना है
लगता साहेब भूल गए हैं इक दिन इनको जाना है
किसकी खातिर जोड़ रहे हो इतनी दौलत बोलो तो
अंत समय में केवल अपना मिट्टी से याराना है
जिसको कोई तोड़ सके ना और बाद भी रह जाए
सत्कर्मो का घर हैं सुन्दर हमको वही बनाना है
जीवन क्या है चढ़ता सूरज फैलाएगा उजियारा
लेकिन सच्चाई है उसको शाम हुए ढल जाना है
कर लो प्राणायाम बहुत से, मगर प्राण भी है जिद्दी
जाने कब ये चल देगा इसका नहीं ठिकाना है
गिरीश पंकज समसामयिक विसंगतियों से व्यथित हो कर कहते हैं-
जब अपना ही छलता है
दिल से लहू टपकता है
खुदगर्जी की ये हद है
अपना हमको खलता है
झूठी दुनिया में कैसे
सच्चा कोई संभलता है
पुण्य यहाँ लगता खोटा
पाप का सिक्का चलता है
जीवन का सच्चा दीया
विश्वासों से जलता है
एक सहारा है सपना
जीवन मेरा कटता है
बेचारा मिहनतवाला
केवल आखें मलता है
भाग्य हमारा जिद्दी है
यह न कभी सुधरता है
जिसमें जितनी चालाकी
उतनी अधिक सफलता है
नन्हीं-सी आँखों में इक
स्वप्न बड़ा-सा पलता है
बच्चे जैसा नादाँ मन
हर पल यहाँ मचलता है
ये गरीब का मौसम है
इक जैसा ही रहता है
धीरज रखना तू ''पंकज''
सूरज सुबह निकलता है.
हिन्दी में गज़लें खूब लिखी जा रही हैं और खूब प्रकाशित हो रही हैं और पढ़ी भी जा रही हैं। इधर गज़ल गायकी की लोकप्रियता ने हिन्दी गज़ल के विकास के प्रति हमें आश्वस्त किया है। गज़ल रूमानी परम्परा से शुरू हुई, लेकिन इसकी विकास यात्रा ने हमें जमाने के दुःख–सुख के साथ शामिल किया है। जाहिर है कि गज़ल अब हमारे और समय के साथ हैं। गिरीश पंकज की ग़ज़लें इस विश्वास को सुदृढ़ बनाती हैं। बानगी देखिए -
इतना अधिक ज़हर मत घोलो साहब जी
जब भी बोलो मीठा बोलो साहब जी
अपनी काया में ही सिमटे रहते हो
कभी-कभी तो घर के हो लो साहब जी
सबको ही तुमने ख़ारिज कर डाला है
अपने को भी इक दिन तौलो साहब जी
दूजे के चेहरे पे कालिख देख रहे
पहले अपना मुंह तो धो लो साहब जी
लोकतंत्र में अंगरेजों के ओ वंशज...
दिल को थोड़ा आज टटोलो साहब जी
रहे रात भर क्लब में वाईन-शाईन पी
भोर हो रही अब तो सो लो साहब जी
अरबो रुपये कमा डाले तुमने अब तक
कहाँ से लूटा मुंह तो खोलो साहब जी
हमने ही भस्मासुर पैदा किये कई
पाप हमारे तुम भी रो लो साहब जी
जो लड़ने निकले हैं तम से
जीतेंगे वे अपने दम से
इस दुनिया क़ी रौनक होगी
आखिर तुमसे और कुछ हम से
कितने बड़े -बड़े ग़म सबके
मत घबरा तू अपने ग़म से
सुख का फंडा उसने जाना
काम चला लेता जो कम से
बदनामी वो सह न पाया
जां दे दी उफ़ लाज-शरम से
जो कहता है खून बहाओ
धर्म नही वो कहूँ कसम से
बात प्यार से बनती पंकज
कभी बनी न न गोली - बम से
जीवन के यथार्थ को रेखांकित करती गिरीश पंकज की ग़ज़लें कथ्य और शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं। भौतिक सुखों को सर्वोपरि मानने वाले अहंकारी व्यक्तियों को ललकारते हुए वे कहते हैं -
दौलत- फौलत, शोहरत-गद्दी इस पर क्या इतराना है
लगता साहेब भूल गए हैं इक दिन इनको जाना है
किसकी खातिर जोड़ रहे हो इतनी दौलत बोलो तो
अंत समय में केवल अपना मिट्टी से याराना है
जिसको कोई तोड़ सके ना और बाद भी रह जाए
सत्कर्मो का घर हैं सुन्दर हमको वही बनाना है
जीवन क्या है चढ़ता सूरज फैलाएगा उजियारा
लेकिन सच्चाई है उसको शाम हुए ढल जाना है
कर लो प्राणायाम बहुत से, मगर प्राण भी है जिद्दी
जाने कब ये चल देगा इसका नहीं ठिकाना है
गिरीश पंकज समसामयिक विसंगतियों से व्यथित हो कर कहते हैं-
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Girish Pankaj |
जब अपना ही छलता है
दिल से लहू टपकता है
खुदगर्जी की ये हद है
अपना हमको खलता है
झूठी दुनिया में कैसे
सच्चा कोई संभलता है
पुण्य यहाँ लगता खोटा
पाप का सिक्का चलता है
जीवन का सच्चा दीया
विश्वासों से जलता है
एक सहारा है सपना
जीवन मेरा कटता है
बेचारा मिहनतवाला
केवल आखें मलता है
भाग्य हमारा जिद्दी है
यह न कभी सुधरता है
जिसमें जितनी चालाकी
उतनी अधिक सफलता है
नन्हीं-सी आँखों में इक
स्वप्न बड़ा-सा पलता है
बच्चे जैसा नादाँ मन
हर पल यहाँ मचलता है
ये गरीब का मौसम है
इक जैसा ही रहता है
धीरज रखना तू ''पंकज''
सूरज सुबह निकलता है.
हिन्दी में गज़लें खूब लिखी जा रही हैं और खूब प्रकाशित हो रही हैं और पढ़ी भी जा रही हैं। इधर गज़ल गायकी की लोकप्रियता ने हिन्दी गज़ल के विकास के प्रति हमें आश्वस्त किया है। गज़ल रूमानी परम्परा से शुरू हुई, लेकिन इसकी विकास यात्रा ने हमें जमाने के दुःख–सुख के साथ शामिल किया है। जाहिर है कि गज़ल अब हमारे और समय के साथ हैं। गिरीश पंकज की ग़ज़लें इस विश्वास को सुदृढ़ बनाती हैं। बानगी देखिए -
इतना अधिक ज़हर मत घोलो साहब जी
जब भी बोलो मीठा बोलो साहब जी
अपनी काया में ही सिमटे रहते हो
कभी-कभी तो घर के हो लो साहब जी
सबको ही तुमने ख़ारिज कर डाला है
अपने को भी इक दिन तौलो साहब जी
दूजे के चेहरे पे कालिख देख रहे
पहले अपना मुंह तो धो लो साहब जी
लोकतंत्र में अंगरेजों के ओ वंशज...
दिल को थोड़ा आज टटोलो साहब जी
रहे रात भर क्लब में वाईन-शाईन पी
भोर हो रही अब तो सो लो साहब जी
अरबो रुपये कमा डाले तुमने अब तक
कहाँ से लूटा मुंह तो खोलो साहब जी
हमने ही भस्मासुर पैदा किये कई
पाप हमारे तुम भी रो लो साहब जी
01 जनवरी 1957 को वाराणसी उ.प्र. में जन्में और रायपुर, छत्तीसगढ़ में निवास कर रहे बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार गिरीश पंकज के अब तक सात उपन्यास, पन्द्रह व्यंग्य संग्रह, दो ग़ज़ल संग्रह, एक लघुकथा संग्रह समेत 52 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । गिरीश पंकज "सद्भावना दर्पण" नामक अनुवाद पत्रिका के संपादक भी हैं।
गिरीश पंकज को हिंदी सेवाश्री सम्मान (ट्रिनिडाड, वेस्ट इंडीज), अट्टहास सम्मान, श्रीलाल शुक्ल स्मृति व्यंग्य सम्मान (लखनऊ), लीलारानी स्मृति सम्मान (पंजाब), आर्य स्मृति सम्मान, रजीस्मृति सम्मान (नई दिल्ली ), गौरव भाष्य सम्मान (बैतूल), पंडित बृजलाल द्विवेदी सम्मान, माखनलाल चतुर्वेदी सम्मान, रामेश्वर गुरु सम्मान, भोपाल मध्यप्रदेश सहित तीस से अधिक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
पत्र पत्रिकाओं, आकाशवाणी, दूरदर्शन, मंच और सोशल मीडिया पर वे लगातार सक्रिय रहते हैं। उनके दोनों ब्लॉग पठनीय हैं।
http://girishpankajkevyangya.blogspot.com
गिरीश पंकज की e- mail ID है गिरीश पंकज को हिंदी सेवाश्री सम्मान (ट्रिनिडाड, वेस्ट इंडीज), अट्टहास सम्मान, श्रीलाल शुक्ल स्मृति व्यंग्य सम्मान (लखनऊ), लीलारानी स्मृति सम्मान (पंजाब), आर्य स्मृति सम्मान, रजीस्मृति सम्मान (नई दिल्ली ), गौरव भाष्य सम्मान (बैतूल), पंडित बृजलाल द्विवेदी सम्मान, माखनलाल चतुर्वेदी सम्मान, रामेश्वर गुरु सम्मान, भोपाल मध्यप्रदेश सहित तीस से अधिक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
पत्र पत्रिकाओं, आकाशवाणी, दूरदर्शन, मंच और सोशल मीडिया पर वे लगातार सक्रिय रहते हैं। उनके दोनों ब्लॉग पठनीय हैं।
http://girishpankajkevyangya.blogspot.com
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ग़ज़ल पाठ करते हुए गिरीश पंकज |
मेरे पास आभार व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं है। धन्य हूँ।
जवाब देंहटाएंसुस्वागतम् गिरीश पंकज जी 🙏
जवाब देंहटाएंइतनी अच्छी ग़ज़लें लिखने के लिए आपका भी शुक्रिया 🙏
गिरीश जी की ग़ज़लें ब्लॉग जगत और पंकज जी के ईश्वर उत्सवों में पढ़ता हूँ और क़ायल हूँ आपकी लेखनी का ...
जवाब देंहटाएंग़ज़ब की ग़ज़लों क्क संकलन है यहाँ ...
हां, वास्तव में गिरीश पंकज जी शायरी के नये प्रतिमान गढ़ने में सिद्धहस्त हैं।
हटाएंबहुत बहुत आभार नासवा जी, टिप्पणी करने के लिए 🙏
हिंदी के लिए उनका व्यापक कार्य गवाह है , गिरीश भाई को बधाई
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंसतीश जी
हटाएंवर्षा जी, दिगम्बर जी और परमप्रिय भाई सतीश जी, आप सब का आभार।
हटाएंआदरणीय गीरीश पंकज जी की रचना धमॆता सदैव शानदार है।
जवाब देंहटाएंडॉ साहिबा, मुझे याद है नई गुदगुदी जयपुर पत्रिका में आपकी गजलें नियमित प्रकाशित होते रही है...
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