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Dr. Varsha Singh |
विश्व पुस्तक दिवस पर विशेष रूप से लिखी मेरीे ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 23 अप्रैल 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
http://yuvapravartak.com/?p=13901
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में मेरी ग़ज़ल इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
📚 किताबें 📖
- डॉ. वर्षा सिंह
दुख- सुख की हैं सखी किताबें।
लगती कितनी सगी किताबें।
जब-जब उभरे घाव हृदय के,
मरहम जैसी लगी किताबें।
असमंजस की स्थितियों में
सदा रहनुमा बनी किताबें।
जीवन की दुर्गम राहों में,
फूलों वाली गली किताबें।
मैं, तुम, सारी दुनिया सोये,
हरदम रहती जगी किताबें।
फ़ुरसत हो तो तुम पढ़ लेना
मैंने भी कुछ लिखी किताबें ।
"वर्षा" की हमसफ़र हमेशा
ख़्वाबों में भी बसी किताबें।
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ग़ज़ल : किताबें - डॉ. वर्षा सिंह http://yuvapravartak.com/?p=13901 |
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (14-04-2019) को "किताबें झाँकती हैं" (चर्चा अंक-3315) पर भी होगी।
जवाब देंहटाएं--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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पुस्तक दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत बहुत आभार आपका..।
जवाब देंहटाएंचर्चा अंक में शामिल किया जाना अत्यंत प्रसन्नता का विषय है...
पुनः आभार 🙏