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शुक्रवार, जुलाई 17, 2020

प्यार की भाषा | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
     
         प्रिय ब्लॉग पाठकों, मेरी यह ग़ज़ल मेरे संग्रह "हम जहां पर हैं" में संग्रहीत है। यह पुरानी ग़ज़ल मुझे लगता है कि आज के हालात में भी आपको ताज़ा-सी महसूस होगी। निवेदन है कि कृपया पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। धन्यवाद !

ग़ज़ल

प्यार की भाषा
        -डॉ. वर्षा सिंह

वह समझ पाते नहीं घर - बार की भाषा।
सीख जो पाते नहीं हैं प्यार की भाषा।

शर्तिया मंझधार में वह नाव डूबेगी,
हो गई विपरीत गर पतवार की भाषा

जी-हज़ूरी, वाहवाही की सदा चाहत,
इसलिए चुभती उन्हें अख़बार की भाषा

और कुछ इतिहास द्वापर का लिखा जाता,
गर भुला देते सभी प्रतिकार की भाषा।

दोस्ती जिसने क़लम के साथ कर ली हो,
रास कब आई उसे तलवार की भाषा ।

गांव में दाख़िल हुई जिस दिन हवा शहरी,
लोग भूले झांझरी झंकार की भाषा ।

बाद मरने के वही अर्थी, वही मरघट ,
काम तब आती नहीं अधिकार की भाषा।

ज़िंदगी की दौड़ में वह रह गया पीछे,
पढ़ न पाया जो यहां रफ्तार की भाषा।

नफ़रतों का तब नहीं होता निशां 'वर्षा',
काश, होती एक गर संसार की भाषा।
             -----------

#ग़ज़लवर्षा #dr_varsha_singh
#हम_जहां_पर_हैं #ग़ज़ल #संसार #अख़बार #प्यार #भाषा

मंगलवार, अप्रैल 07, 2020

लॉकडाउन संदर्भित ग़ज़ल..... तालाबंदी के आलम में - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

     प्रस्तुत है लॉकडाउन संदर्भित मेरी ताज़ा ग़ज़ल ....

लॉकडाउन संदर्भित ग़ज़ल

तालाबंदी के आलम में
         - डॉ. वर्षा सिंह

कट जाएंगे बेशक ये भी, बेहद मुश्किल वाले दिन।
तालाबंदी के आलम में, लगते भोले-भाले दिन।

ग़ैरज़रूरी आपाधापी, कहीं दुबक कर बैठ गई,
लम्हा-लम्हा कछुए जैसे सरके ढीले-ढाले दिन।

बस्ते एक तरफ रख्खे हैं, ऑनस्क्रीन पढ़ाई है,
कुछ भी कह लो लेकिन ये हैं बच्चों के रखवाले दिन।

वक़्त सुरक्षित दूरी का है, नज़दीकी से ख़तरा है,
दिल को रखना साफ़ हमेशा, ढल जाएंगे काले दिन।

सावधान रहना ही होगा जगज़ाहिर इस आफ़त से,
बन जाएं नासूर कहीं ना बढ़ते-बढ़ते छाले दिन।

यदाकदा घटना घट जाती, नियमों के उल्लंघन की
इंसानी फ़ितरत के आगे मुज़रिम बैठे-ठाले दिन।

ये भी तय है कठिन दौर कुछ सीख नई दे जाता है
भूल न पायेंगे जीवन भर, सुआ सरीखे पाले दिन।

फ़ुर्सत के लम्हात ये सोचो, बाद मिले हैं बचपन के,
याद आते हैं सोते-जगते "वर्षा" देखे-भाले दिन।
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 मेरी यह ग़ज़ल आज web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 07.04.2020 में  प्रकाशित हुई है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=28349



#ग़ज़लवर्षा #युवाप्रवर्तक
#लॉकडाउन #कोरोना #दिन


शुक्रवार, मार्च 06, 2020

"ग़ज़ल जब बात करती है" का विमोचन - डॉ. वर्षा सिंह


       मेरे छठवें ग़ज़ल संग्रह "ग़ज़ल जब बात करती है" का विमोचन समारोह रविवार दिनांक 16 फरवरी 2020 को आदर्श संगीत महाविद्यालय में संपन्न हुआ।श्यामलम् द्वारा आयोजित इस गरिमामय आयोजन में मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि निर्मल चंद निर्मल ने कहा कि वर्षा सिंह हिंदी की श्रेष्ठ ग़ज़लकार तो हैं ही, साथ ही उन्होंने सागर के कवि लेखकों को अपनी कलम से उजागर किया है। सागर के किस कवि में क्या गहराई है, वर्षा सिंह के पास इसका अनुमानित नाप है। आचरण समाचार पत्र में उनका स्तंभ इसका प्रमाण है।डॉ.हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो.सुरेश आचार्य ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि डॉ.वर्षा सिंह के ग़ज़ल संग्रह "ग़ज़ल जब बात करती है" में उनकी समाज चिंता, पर्यावरण की परवाह, क्षय होते हुए मानव मूल्य और आधुनिकता के चक्कर में सांस्कृतिक मूल्यों को चोट पहुंचाने की तकलीफ को साफ पहचाना जा सकता है। एक अच्छी रचनाकार होने के नाते उन्हें  भारतीयता की गहरी पहचान है।प्रेम,विरह और चिंताएं उनकी रचनाओं में स्पष्ट पहचानी जा सकती हैं। वे देश की बड़ी कवयित्रियों में शामिल हैं। बुंदेलखंड भी उनकी रचनाओं से झांकता है।हमें उनसे बड़ी उम्मीदें हैं।



इस अवसर पर डॉ. श्याम मनोहर सिरोठिया के समीक्षा आलेख का वाचन करते हुए विशिष्ट अतिथि साहित्यकार डॉ.महेश तिवारी ने कहा कि सामाजिक मूल्यों के विखंडन की दौड़ में प्रेम का संदेश देती हुई डॉ.वर्षा सिंह की ग़ज़लें खरे सोने जैसी प्रमाणित हैं। ये बुद्धि कौशल से साहित्य पीठिका पर रखे गये अप्रतिम सृजन का शानदार स्वरूप हैं, जो पाठक के मन को प्रभावित करती हैं,अपना मुरीद बना लेती हैं।


सागर विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के सहा. प्राध्या. डॉ शशि कुमार सिंह ने संग्रह पर समीक्षा करते हुए कहा कि डा. वर्षा सिंह का ग़ज़ल संग्रह " गजल जब बात करती है" वर्तमान हिन्दी ग़ज़ल का एक श्रेष्ठ निदर्शन है।  यह ग़ज़ल संग्रह ग़ज़ल के मानकों पर खरा उतरता है तथा प्रेम के साथ साथ मनुष्यता का संदेश भी देता है। कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक भावप्रकाशन इस ग़ज़ल संग्रह की प्रमुख विशेषता है।
आदर्श दुबे ने समीक्षा आलेख में वर्षा जी की शायरी को भीड़ से अलग बताते हुए कहा कि उनकी शायरी जहां रिवायती लहज़े को आसानी से,आसान ज़बान में ढालती है वहीं नए ज़दीद लहज़े और नए प्रयोगों को भी अपने ढंग से अपनाती है।


कार्यक्रम में ग़ज़लकार डॉ. वर्षा सिंह का आयोजक संस्था श्यामलम् द्वारा शाल,श्रीफल,पष्पगुच्छ भेंट कर अभिनंदन  किया गया।कवि आर.के.तिवारी ने स्वरचित अभिनंदन गीत का गायन किया।श्यामलम् सचिव कपिल बैसाखिया ने वर्षा सिंह का जीवन परिचय वाचन किया।

डॉ.वर्षा सिंह ने श्यामलम् संस्था के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक शहर में ऐसी जागरूक संस्थाएं हों तो साहित्य पर कभी कोई संकट नहीं आ सकता। अपनी ग़ज़लों के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मैं समाज में जो कुछ घटित होता देखती हूं उसे ही अपनी ग़ज़लों में पिरोती हूं। इसीलिये मुझे आम बोलचाल की भाषा में ग़ज़ल कहना पसंद है।
कार्यक्रम का प्रारंभ मां सरस्वती की पूजा अर्चन तथा बाल सरस्वती सुश्री ऐश्वर्या दुबे द्वारा सरस्वती वंदना गायन से हुआ।डॉ.सुश्री शरद सिंह,डॉ.चंचला दवे,सुनीला सराफ,नंदिनी चौधरी,नीतू नयन,ममता भूरिया, श्रीमती चतुर्वेदी, नम्रता फुसकेले व देवकी भट्ट नायक दीपा ने अतिथियों को पुष्प गुच्छ भेंट कर उनका स्वागत किया श्यामलम् अध्यक्ष उमाकांत मिश्र ने स्वागत उद्बोधन दिया।कवि राधा कृष्ण व्यास ने अंजीर का पौधा भेंट किया।बुंदेलखंड हिन्दी साहित्य संस्कृति विकास मंच द्वारा भी सम्मान किया गया।
कार्यक्रम का गरिमामय संचालन डॉ.अंजना चतुर्वेदी तिवारी ने किया तथा सुश्री डॉ.शरद सिंह ने आभार प्रदर्शन किया।



इस अवसर पर शिवशंकर केसरी,पं.शंभुदयाल पाण्डेय,डॉ.जीवनलाल जैन,डॉ.उदय जैन, लक्ष्मी नारायण चौरसिया, प्रो.के.एस.पित्रे, डॉ. आशुतोष मिश्र,डॉ.कन्हैया त्रिपाठी,डॉ.आशीष द्विवेदी,अंबिका यादव, डॉ.नवनीत धगट,हरी सिंह ठाकुर,डॉ.राकेश शर्मा,डॉ.रामरतन पांडेय, डॉ.सतीश पांडेय, डॉ.भुवनेश्वर तिवारी,के.एल. तिवारी अलबेला,डॉ. ऋषभ भारद्वाज,रवींद्र दुबे कक्का,मुकेश निराला, राजेंद्र दुबे कलाकार,पप्पू तिवारी,पूरन सिंह राजपूत, डॉ.अरविंद गोस्वामी,शमीम बानो,डॉ.अभिषेक ऋषि,आर.के.चतुर्वेदी,आज्ञा संतोष तिवारी, अयाज़ सागरी,एम.शरीफ, असरार अहमद, डॉ.एस.आर.श्रीवास्तव,सुबोध श्रीवास्तव, विश्वनाथ चौबे, पुष्पदंत हितकर, ज.ला.राठौर प्रभाकर,‌ टी.आर.त्रिपाठी,पुष्पेंद्र दुबे,वीरेंद्र प्रधान,हरी शुक्ला,कुंदन पाराशर, अशोक तिवारी अलख, शैलेष‌ शुक्ला,पैट्रिस फुसकेले, मितेन्द्र सिंह सेंगर,रमेश दुबे,भगवान दास रायकवार,देवीसिंह राजपूत,जी.एल.छत्रसाल, अखिलेश शर्मा,अतुल श्रीवास्तव,अंबर चतुर्वेदी चिंतन,गोविंद दास नगरिया,प्रभात‌ कटारे नलिन जैन, गणेश चौरसिया सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

















 


शनिवार, जनवरी 25, 2020

🇮🇳 गणतंत्र दिवस पर विशेष ग़ज़ल : 🇮🇳 सम्मान तिरंगा है 🇮🇳 - डॉ.वर्षा सिंह 🇮🇳

Happy Republic Day - Dr. Varsha Singh

     🇮🇳♥🇮🇳  🇮🇳♥🇮🇳  🇮🇳♥🇮🇳  🇮🇳♥🇮🇳

सम्मान तिरंगा है
       - डॉ. वर्षा सिंह

शान  तिरंगा  है, अपनी  आन तिरंगा है ।
सारी दुनिया से कह दो सम्मान तिरंगा है।

वीरों ने कुर्बानी  दे कर इसे सजाया  है,
देशभक्ति गौरवगाथा का गान तिरंगा है।

हम भारत के वासी, हमको निर्भय रहना है,
हर इक भारतवासी का अभिमान तिरंगा है।

लोकतंत्र विश्वास हमारा, सांस भारती हैै,
अमृत है गणतंत्र और वरदान तिरंगा है।

संविधान के प्रति निष्ठा पहचान हमारी है,
कभी न झुकने पाएगा,  ईमान तिरंगा है।

जाति-धर्म, भाषाएं, बोली ढेरों हैं लेकिन
सबके दिल की एक कथा, उन्वान तिरंगा है

"वर्षा" हमने जन्मभूमि को मां का मान दिया,
रहे सदा सबसे ऊंचा, अरमान तिरंगा है।

          🇮🇳♥🇮🇳    -------------------  🇮🇳♥🇮🇳
गणतंत्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ. वर्षा सिंह
     🇮🇳♥🇮🇳  🇮🇳♥🇮🇳  🇮🇳♥🇮🇳  🇮🇳♥🇮🇳






प्रिय मित्रों,
      गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ❤🇮🇳❤
      मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 26 जनवरी 2020 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=24567



शनिवार, जनवरी 18, 2020

"ग़ज़ल जब बात करती है" ग़ज़ल संग्रह अमेजन पर भी उपलब्ध - डॉ. वर्षा सिंह


      
"ग़ज़ल जब बात करती है "- डॉ. वर्षा सिंह
  
       मैं अपने सभी सम्मानीय ब्लॉग पाठकों  एवं ग़ज़ल के सुधी पाठकों को यह सूचित करना चाहती हूं कि मेरा नवीनतम ग़ज़लसंग्रह "ग़ज़ल जब बात करती है" अब #Amazon पर भी उपलब्ध है... यदि आप इसे पढ़ना चाहें तो अमेजन से इसे सुविधापूर्वक मंगा सकते हैं।
 Link यहां दे रही हूं... 
🙏


गुरुवार, दिसंबर 26, 2019

ग़ज़ल ... मर्ज़ी क्या -डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh
समझौता मेरे ही ज़िम्मे, नहीं तुम्हारा कुछ भी क्या
माफ़ी मैं ही मांगूं आख़िर मेरी ऐसी ग़लती क्या

हुईं क़िताबें कम तो भारी सूचनाओं का बोझ बढ़ा
सारा बचपन हवा हो गया, बच्चे भूले मस्ती क्या

यादों का संसार तिलस्मी, यादों के साये लम्बे
यादें तो यादें होती हैं मीठी क्या और खट्टी क्या

माना जीवन भर की खुशियां नहीं तुम्हारे वश में हैं
लेकिन मिलने पर भी आख़िर दोगे न इक झप्पी क्या

एक से बढ़ कर एक तमाशा किया सियासतदानों ने
रहे सलामत कुर्सी चाहे रिश्तों की हो कुर्की क्या

मनमानी कर तुमने अपने नियम-क़ायदे गढ़ डाले
एक दफ़ा तो पूछा होता "वर्षा" तेरी मर्ज़ी क्या
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मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 27 दिसम्बर 2019 में स्थान मिला है। युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏 मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ... http://yuvapravartak.com/?p=23459

शनिवार, नवंबर 02, 2019

गुस्सा कहीं का उतारा कहीं - डॉ. वर्षा सिंह


कहना जहां था, कहा कुछ नहीं
गुस्सा कहीं का उतारा कहीं

होगी जहां दर्द की दास्तां
मिरी शायरी भी मिलेगी वहीं


रविवार, सितंबर 08, 2019

ग़ज़ल... ओ मेरी नादान ज़िन्दगी - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       मेरी इस ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 08 सितम्बर 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=18423

ग़ज़ल
         ओ मेरी नादान ज़िन्दगी !
                  - डॉ. वर्षा सिंह

अब तो कहना मान ज़िन्दगी
सुख की चादर तान ज़िन्दगी

ढेरों आंसू लिख पढ़ डाले
रच ले कुछ मुस्कान ज़िन्दगी

अपनी मंजिल आप ढूंढ ले
ओ मेरी नादान ज़िन्दगी

रुठा- रुठी छोड़ अरे अब
दो दिन की मेहमान ज़िन्दगी

साथ किसी के कौन गया कब
इस सच को पहचान ज़िन्दगी

सारे मौसम इसके अनुचर
समय बड़ा बलवान ज़िन्दगी

हंसकर तय करने ही होंगे
सांसो के सोपान ज़िन्दगी

आह न निकले तनिक कंठ से
शिव बनकर विषपान ज़िन्दगी

"वर्षा" माटी का तन इस पर
करना मत अभिमान ज़िन्दगी
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#ग़ज़लवर्षा

http://yuvapravartak.com/?p=18423

गुरुवार, अगस्त 22, 2019

ग़ज़ल..... शेष नहीं वे क्षण - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       मेरी इस  को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 19 अगस्त 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=17702

ग़ज़ल

   शेष नहीं वे क्षण...
           - डॉ. वर्षा सिंह

सर्वनाम  रह  गये गुमी  हैं संज्ञाएं ।
शब्द बिंब ही अर्थों को अब बहकाएं ।

संदर्भों ने बांध दिया संबंधों को ,
निर्धारित कर दी हैं सब की सीमाएं ।

शेष नहीं वे क्षण जो जोड़ें तन मन को ,
भीगे उजियालों से माथा सहलाएं ।

तटस्थता का राग उन्हीं ने छेड़ा है ,
आदत जिनकी उलझें, सबको उलझाएं ।

कालजयी होने का जिनको दंभ यहां, अक्सर छूटीं उनके हाथों वल्गाएं ।

समझौते की चर्चा झेल न पाई है ,
निर्णय पर कायम रहने की विपदाएं ।

अंतरिक्ष में नीड़ भला कब बन पाए ,
आश्रय देती हैं भू पर ही शाखाएं ।

अवसरवादी सुविधा भोगी सांसों को,
सहनी ही पड़ती हैं ढेरों कुंठाएं ।

व्यथा विरत कवि नहीं कभी भी हो पाये,
“ मां निषाद” वाल्मीकि रचेंगे रचनाएं ।

कहते हैं आशाओं का आकाश वृहद, चुटकी भर मैंने भी भर ली आशाएं ।

पूरी की पूरी  तस्वीर  उकेरेंगी,
भले अधूरी “वर्षा” की हैं रेखाएं ।
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#ग़ज़लवर्षा