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Dr. Varsha Singh |
देश भर में अनेक स्थानों पर लगातार घट रही छोटी बच्चियों से दुष्कर्म की घटनाओं पर मेरी अश्रुपूरित अभिव्यक्ति के रूप में सृजित मेरी इस ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 12 जून 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
ग़ज़ल
क्या हुआ है आज मेरे देश को !
-डॉ. वर्षा सिंह
शर्म से इंसान की आंखें झुकीं, क्या हुआ है आज मेरे देश को!
क्या सभी संवेदनाएं मर चुकीं ! क्या हुआ है आज मेरे देश को!
हो रहा गुलशन कलंकित अब यहां, नोच कर कलियों को फेंका जा रहा,
आसमां काला, हुई काली ज़मीं, क्या हुआ है आज मेरे देश को।
रोज़ दुष्कर्मों की ख़बरें मिल रहीं, संस्कारों का गला घुंटने लगा,
आबरू महफूज़ दिखती है नहीं, क्या हुआ है आज मेरे देश को।
हो रहे हैं लोग क्यों वहशी यहां, सोचने की शक्ति मानो शून्य है,
किस तरह घटनाएं ये होने लगीं, क्या हुआ है आज मेरे देश को।
त्रासदी पहुंची चरम पर इस क़दर, हृदय पर दुख की शिलाएं टूटतीं,
ख़ून के आंसू दिशाएं रो रहीं, क्या हुआ है आज मेरे देश को।
है विह्वल "वर्षा", दुखी बादल हुए, लोग कुछ कैसे अरे, पागल हुए !
बच्चियां भी अब सुरक्षित हैं नहीं, क्या हुआ है आज मेरे देश को।
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
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Ghazal Yatra - Dr. Varsha Singh |
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (14-06-2019) को "काला अक्षर भैंस बराबर" (चर्चा अंक- 3366) पर भी होगी।
जवाब देंहटाएं--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
अत्यंत आभार आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'जी 🙏
जवाब देंहटाएंअति सुंदर लेख
जवाब देंहटाएंअति सुंदर महोदय Computer Sikho
जवाब देंहटाएंधन्यवाद गणपत जी
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