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| Dr. Varsha Singh |
घर वापसी करते प्रवासी श्रमिकों की व्यथा-कथा को समर्पित एक ग़ज़ल
दर -दर की ठोकर लिक्खी है
- डॉ. वर्षा सिंह
कांधे पर है बोझ गृहस्थी का पांवों में छाले हैं।
दर -दर की ठोकर लिक्खी है, खोटी क़िस्मत वाले हैं।
गांव, गली, घर छोड़ा था सब, पैसे चार कमाने को,
अब जाना ये महानगर भी दिल के कितने काले हैं।
भूख-प्यास से बढ़ कर भैया, नहीं बिमारी कोई है,
क़दम-क़दम भुखमरी-ग़रीबी, यहां सैकड़ों ताले हैं।
अम्मा, बाबू, चंदा, बुधिया, गुड्डू, मुन्नी, रामकली
एक मजूरी के बलबूते कितने प्राणी पाले हैं।
दर्ज़ रहेंगे तारीखों में "वर्षा" मुश्किल वाले दिन,
अगर न टूटी सांस कहेंगे- 'दुर्दिन देखे-भाले हैं।'
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आज web magazine युवाप्रवर्तक दि. 14.05.2020 में मेरी यह ग़ज़ल "दर -दर की ठोकर लिक्खी है" प्रकाशित हुई है...
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=32685
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