रविवार, सितंबर 08, 2019

ग़ज़ल... ओ मेरी नादान ज़िन्दगी - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       मेरी इस ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 08 सितम्बर 2019 में स्थान मिला है।
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ग़ज़ल
         ओ मेरी नादान ज़िन्दगी !
                  - डॉ. वर्षा सिंह

अब तो कहना मान ज़िन्दगी
सुख की चादर तान ज़िन्दगी

ढेरों आंसू लिख पढ़ डाले
रच ले कुछ मुस्कान ज़िन्दगी

अपनी मंजिल आप ढूंढ ले
ओ मेरी नादान ज़िन्दगी

रुठा- रुठी छोड़ अरे अब
दो दिन की मेहमान ज़िन्दगी

साथ किसी के कौन गया कब
इस सच को पहचान ज़िन्दगी

सारे मौसम इसके अनुचर
समय बड़ा बलवान ज़िन्दगी

हंसकर तय करने ही होंगे
सांसो के सोपान ज़िन्दगी

आह न निकले तनिक कंठ से
शिव बनकर विषपान ज़िन्दगी

"वर्षा" माटी का तन इस पर
करना मत अभिमान ज़िन्दगी
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#ग़ज़लवर्षा

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गुरुवार, अगस्त 22, 2019

ग़ज़ल.... मूल्य जीवन के बदलते जा रहे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       मेरी इस ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 22 अगस्त 2019 में स्थान मिला है।
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ग़ज़ल

मूल्य जीवन के बदलते जा रहे ....

                 - डॉ. वर्षा सिंह

वर्जनाओं से बिखरते जा रहे
दर्पणी सपने दरकते जा रहे

जो अप्रस्तुत है उसी की चाह में
रिक्त सारे पंख झड़ते जा रहे

प्यार का मधुबन न उग पाया यहां
कसमसाते छंद ढलते जा रहे

कष्ट की काई जमीं हर शब्द पर
अर्थ के प्रतिबिंब मिटते जा रहे

चुक रहे संदर्भ रिश्तों के सभी
हम स्वयं से आज कटते जा रहे

लीक के अभ्यस्त पांवों के तले
मुक्ति के अनुबंध घिसते जा रहे

बन न पाया मन कभी निर्वात जल
हम हिलोरों में हुमगते जा रहे

और कब तक अंधकूपी रात दिन
पूछते पल-छिन गुज़रते जा रहे

जागरण “वर्षा’’ ज़रूरी हो गया
मूल्य जीवन के बदलते जा रहे

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#ग़ज़लवर्षा


ग़ज़ल..... शेष नहीं वे क्षण - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

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ग़ज़ल

   शेष नहीं वे क्षण...
           - डॉ. वर्षा सिंह

सर्वनाम  रह  गये गुमी  हैं संज्ञाएं ।
शब्द बिंब ही अर्थों को अब बहकाएं ।

संदर्भों ने बांध दिया संबंधों को ,
निर्धारित कर दी हैं सब की सीमाएं ।

शेष नहीं वे क्षण जो जोड़ें तन मन को ,
भीगे उजियालों से माथा सहलाएं ।

तटस्थता का राग उन्हीं ने छेड़ा है ,
आदत जिनकी उलझें, सबको उलझाएं ।

कालजयी होने का जिनको दंभ यहां, अक्सर छूटीं उनके हाथों वल्गाएं ।

समझौते की चर्चा झेल न पाई है ,
निर्णय पर कायम रहने की विपदाएं ।

अंतरिक्ष में नीड़ भला कब बन पाए ,
आश्रय देती हैं भू पर ही शाखाएं ।

अवसरवादी सुविधा भोगी सांसों को,
सहनी ही पड़ती हैं ढेरों कुंठाएं ।

व्यथा विरत कवि नहीं कभी भी हो पाये,
“ मां निषाद” वाल्मीकि रचेंगे रचनाएं ।

कहते हैं आशाओं का आकाश वृहद, चुटकी भर मैंने भी भर ली आशाएं ।

पूरी की पूरी  तस्वीर  उकेरेंगी,
भले अधूरी “वर्षा” की हैं रेखाएं ।
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#ग़ज़लवर्षा

गुरुवार, अगस्त 15, 2019

🇮🇳 ❤ स्वाधीनता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ❤ 🇮🇳 ... डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

   🌺 🙏 🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं 🇮🇳 🙏🌺

आज़ादी  के  गीत  हमेशा  गाएंगे ।
अपना प्यारा परचम हम लहराएंगे ।

संघर्षों के बाद मिली जो आज़ादी ,
उसका हम इतिहास सदा दोहरायेंगे ।

बलिदानों की गाथा को आदर्श बना,
नई राह पर  क़दम बढ़ाते  जाएंगे ।

चांद छू लिया, मंगल तक जा पहुंचेंगें,
अंतरिक्ष को  धरती  पर ले लाएंगे ।

एक देश है भारत, रंग हज़ारों हैं ,
रंग एकता का  "वर्षा"  दिखलाएंगे ।

         - डॉ. वर्षा सिंह


रविवार, अगस्त 04, 2019

शुभ मित्रता दिवस HAPPY FRIENDSHIP DAY dt. 04. 08.2019

Dr. Varsha Singh
           मेरी इस ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 24 जुलाई 2019 में स्थान मिला है।
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*ग़ज़ल*

दोस्त वही सच्चा है ....

                 - डॉ. वर्षा सिह

भूली बिसरी याद जाग कर हलचल करती है दिल में ।
सूखा फूल मिला हो जैसे किसी पुराने नाविल में ।

एक हंसी दे जाता है और एक ख़ुशी ले जाता है,
फ़र्क यही होता है जीवनदाता में और क़ातिल में ।

होना क्या था और हुआ क्या, भेद न मन कर पाता है,
अर्थ बदल जाते हैं अक़्सर सपनों वाली झिलमिल में ।

यूं तो सूची बहुत बड़ी है, "लाइक" करने वालों की,
लेकिन दोस्त वही सच्चा है काम जो आये  मुश्किल में ।

"वर्षा" नफरत के बदले में नफरत ही हासिल होती,       छिपी हुई रहती है दुनिया नन्हीं सी इस्माइल में ।
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#ग़ज़लवर्षा
ग़ज़ल- डॉ. वर्षा सिंह # ग़ज़लवर्षा

शनिवार, जुलाई 20, 2019

ग़ज़लों में बारिश और बारिश में ग़ज़लें - डॉ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singhdd 

आषाढ़ बीत गया और श्रावण आ गया.... जी हां यानी आ गए हैं बारिशों के दिन। बारिशों की रातें । सुबह बारिश, शाम बारिश, दोपहर बारिश यानी हर पहर बारिश। बारिश और बारिश । तो आइए आज हम बातें करें बारिश की और ग़ज़लों की यानी ग़ज़लों में बारिश और बारिश में गजलें.... कैफ़ भोपाली का यह ख़ूबसूरत शेर देखें ....

दर-ओ-दीवार पे शक्लें सी बनाने आई
फिर ये बारिश मिरी तन्हाई चुराने आई
- कैफ़ भोपाली

  उर्दू के ग़ज़लगो तहज़ीब हाफ़ी काग़ज़ की किश्ती से अपने वज़ूद की तुलना करते हुए कहते हैं....

मैं कि काग़ज़ की एक कश्ती हूँ
पहली बारिश ही आख़िरी है मुझे
- तहज़ीब हाफ़ी

शायर मोहम्मद अल्वी कहते हैं कि बारिश धूप की गुज़ारिश पर ही आई है...

धूप ने गुज़ारिश की
एक बूँद बारिश की
     - मोहम्मद अल्वी

तो रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' कह उठते हैं....

आज फिर बारिश डराने आ गयी।
पर्वतों पर कहर ढाने आ गयी।

मेघ छाये-गगन काला हो गया,
Roop Chandra Shastri Mayank
चैन आँखों का चुराने आ गयी।।

लीलने को अब नहीं कुछ भी बचा
राग फिर किसको सुनाने आ गयी?

गाँव की वीरान कुटिया पूछती
क्यों यहाँ आफत मचाने आ गयी?

जिन्दगी के आशियाने ढह गये,
पत्थरों को अब सताने आ गयी।

अब नहीं भाता तुम्हारा “रूप” हमको,
क्यों यहाँ सूरत दिखाने आ गयी?

       -डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

यथार्थवादी गजलों के रचनाकार दुष्यंत कुमार का बारिश के प्रति नजरिया कुछ और ही है । बारिश की गजलें और गजलों में बारिश दुष्यंत की अपनी शैली में कुछ इस तरह से बयां होती है...

देख, दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली
ये ख़तरनाक सचाई नहीं जाने वाली

कितना अच्छा है कि साँसों की हवा लगती है
आग अब उनसे बुझाई नहीं जाने वाली

एक तालाब-सी भर जाती है हर बारिश में
मैं समझता हूँ ये खाई नहीं जाने वाली
     - दुष्यंत कुमार

अख़्तर होशियारपुरी के ये अशआर यथार्थ के बेहद करीब हैं और उन गरीबों की बात करते हैं जिनके कच्चे मकान बारिश में अक्सर टूट फूट जाते हैं....

कच्चे मकान जितने थे बारिश में बह गए
वर्ना जो मेरा दुख था वो दुख उम्र भर का था

     - अख़्तर होशियारपुरी

दिगंबर नासवा भी कुछ इसी तरह के बेहद खूबसूरत अशआर कहते हैं जिसमें दुनिया का दुख दर्द और शायर का दर्द एकाकार होता दिखाई देता है....

खुल कर बहस तो ठीक है इल्जाम ना चले
जब तक न फैसला हो कोई नाम ना चले

Digambar Nasawa
तुम शाम के ही वक़्त जो आती हो इसलिए
आए कभी न रात तो ये शाम ना चले

बारिश के मौसमों से कभी खेलते नहीं
टूटी हो छत जो घर की तो आराम ना चले
    - दिगम्बर नासवा

इश्क के रंग में डूबे हुए शेर कहने वाले शायर जमाल एहसानी कुछ इस तरह के अशआर कहते हैं बारिश में अपने महबूब को याद करते हुए....

उस ने बारिश में भी खिड़की खोल के देखा नहीं
भीगने वालों को कल क्या-क्या परेशानी हुई

     - जमाल एहसानी

 तो वहीं उर्दू के मशहूर शायर अंजुम सलीमी बारिश में  आग लगाने वाली ख़ूबसूरत बात को इन अल्फाजों में बयां करते हैं...

साथ बारिश में लिए फिरते हो उस को 'अंजुम'
तुम ने इस शहर में क्या आग लगानी है कोई

   - अंजुम सलीमी

कवयित्री डॉ. (सुश्री) शरद सिंह हिंदी और उर्दू में समान अधिकार रहते हुए बड़ी ख़ूबसूरती के साथ बारिश में भीगने की बात को कुछ इस तरह बयां करती हैं...

घर से निकलो, भीगें हम तुम बारिश में
Dr. (Miss) Sharad Singh
दो पल जी लें, झूमें हम तुम बारिश में

बह निकली निर्बाध यहां जलधारा भी
कुछ पल साथ बिता लें हम तुम बारिश में

    - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की इस ग़ज़ल के भी कुछ शेर देखें.....

भीगे मौसम में बारिश की लिख दे मनवा एक कहानी ।
एक कहानी ऐसी जिसमें न कोई राजा न कोई रानी।

ताल तलैया पोखर नदियां, पानी से भीगे हर आखर
राग-द्वेष और दुनियादारी, ये बातें सब आनी-जानी।

बादल हो कान्हा के जैसे  भीगे तो हर पोर भिगाए
 सूखे मौसम के बदले हो नन्हीं बूंदों की मनमानी।

          -  डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

 कुंवर बेचैन ने कुछ इस तरह अल्फाज़ दिए हैं अपने शेरों के माध्यम से....

शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई-सी तुम
ज़िन्दगी है धूप, तो मदमस्त पुरवाई-सी तुम

आज मैं बारिश मे जब भीगा तो तुम ज़ाहिर हुईं
जाने कब से रह रही थी मुझमें अंगड़ाई-सी तुम

चाहे महफ़िल में रहूं चाहे अकेले में रहूं
गूंजती रहती हो मुझमें शोख शहनाई-सी तुम

लाओ वो तस्वीर जिसमें प्यार से बैठे हैं हम
मैं हूं कुछ सहमा हुआ-सा, और शरमाई-सी तुम

मैं अगर मोती नहीं बनता तो क्या बनता ‘कुँअर’
हो मेरे चारों तरफ सागर की गहराई-सी तुम

– कुँअर बेचैन

 बशीर बद्र अपने दिल को बारिशों में फूल सा कहते हुए अपनी बात कुछ इस तरह बयां करते हैं....

मैं कहता हूँ वो अच्छा बहुत है,
मगर उसने मुझे चाहा बहुत है।

खुदा इस शहर को महफूज रख़े,
ये बच्चो की तरह हँसता बहुत है।

मैं तुझसे रोज मिलना चाहता हूँ,
मगर इस राह में खतरा बहुत है।

मेरा दिल बारिशों में फूल जैसा,
ये बच्चा रात में रोता बहुत है।

 अमित अहद ने बारिश के काफिए को लेकर बड़े ख़ूबसूरत शेर कहे हैं....

जब भी बरसी अज़ाब की बारिश
रास आयी शराब की बारिश

मैंने पूछा कि प्यार है मुझसे?
उसने कर दी गुलाब की बारिश

मैंने इक जाम और माँगा था
उसने कर दी हिसाब की बारिश

देर तक साथ भीगे हम उसके
हमने यूँ कामयाब की बारिश

प्यार से रोक दी ‘अहद’ मैंने
आज उसके इताब की बारिश

       - अमित अहद
.... और अब आज की चर्चा के अंत में वर्षा यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ वर्षा सिंह  की यह ग़ज़ल जो बारिशों के नाम है, देखें....

आए बारिशों के दिन।
बहकती ख़्वाहिशों के दिन।

भीगा है धरा का तन
गए अब गर्दिशों के दिन।

नदी चंचल, हवा बेसुध
नहीं अब बंदिशों के दिन।

लता झाड़ी गले मिलती, 
भुला कर रंजिशों के दिन।

हुई "वर्षा," हुए पूरे
सुलह की कोशिशों के दिन।
- डॉ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh # Ghazal Yatra

बुधवार, जुलाई 10, 2019

आए बारिशों के दिन... ग़ज़ल - डॉ. वर्षा सिंह


       मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 10 जुलाई 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=16573

बारिशों के दिन
                 - डॉ. वर्षा सिंह

आए बारिशों के दिन।
बहकती ख़्वाहिशों के दिन।

भीगा है धरा का तन
गए अब गर्दिशों के दिन।

नदी चंचल, हवा बेसुध
नहीं अब बंदिशों के दिन।

लता झाड़ी गले मिलती,
भुला कर रंजिशों के दिन।

हुई "वर्षा," हुए पूरे
सुलह की कोशिशों के दिन।
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#ग़ज़लवर्षा

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