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Dr. Varsha Singh |
लॉकडाउन के सोशल डिस्टेंसिंग वाले इस दौर में किताबों की महत्व बढ़ गया है। किताबों की महत्ता के प्रति समर्पित मेरी यह ग़ज़ल प्रस्तुत है....
लगती भले हों पहेली किताबें ।
बनती हैं हरदम सहेली किताबें।
भले हों पुरानी कितनी भी लेकिन
रहती हमेशा नवेली किताबें।
देती हैं भाषा की झप्पी निराली
अंग्रेजी, हिन्दी, बुंदेली किताबें।
चाहे ये दुनिया अगर रूठ जाये
नहीं रूठती इक अकेली किताबें।
शब्दों की ख़ुशबू से तर-ब-तर सी
महकाती "वर्षा", हथेली किताबें।
📚 - डॉ. वर्षा सिंह
web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 04.04.2020 में मेरी यह ग़ज़ल "किताबें" प्रकाशित हुई है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=27973
#ग़ज़लवर्षा
#किताबें
#युवाप्रवर्तक
सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद ओंकार जी 🙏
हटाएंबहुत आभार कुलदीप जी 🙏
जवाब देंहटाएंबहुत ही लाजवाब गजल..
जवाब देंहटाएंवाह!!!
बधाई आपको
हार्दिक धन्यवाद सुधा जी 🙏
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