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| Dr. Varsha Singh |
नाम तुम्हारा
- डॉ. वर्षा सिंह
सुनते हैं सदी पहले कुछ और नज़ारा था
इस रेत के दरिया में पानी था, शिकारा था
रिश्तों से, रिवाज़ों से, बेख़ौफ़ हथेली पर
जो नाम लिखा मैंने, वो नाम तुम्हारा था
मुद्दत से मुझे कोई, बेफ़िक्र न मिल पाया
हर शख़्स की आंखों में चिंता का पिटारा था
दंगों ने, फ़सादों ने बस्ती ही जला डाली
जिस ओर नज़र डाली, उस ओर शरारा था
हैरान न अब होना, आंधी जो चली आई
ख़ामोश उदासी ने हलचल को पुकारा था
ज़िद पार उतरने की, हो पाई नहीं पूरी
डूबी थी जहां किश्ती, कुछ दूर किनारा था
थक-हार के लोगों ने, चर्चा ही बदल डाली
समझा न कोई कुछ भी, क्या ख़ूब इशारा था
जिस रात की आंखों में, मैं झांक नहीं पाई
उस रात की आंखों का, हर ख़्वाब सितारा था
मर-मर के बिताई है "वर्षा" ने उमर सारी
कहने को हर एक लम्हा, जी-जी के गुज़ारा था
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)