गुरुवार, मार्च 18, 2021

औरत | महिलाओं को समर्पित | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

ग़ज़ल


औरत

- डॉ. वर्षा सिंह

ख़ूबसूरत सा ख़्वाब है औरत

ज़ुल्मतों का जवाब है औरत


इसको पढ़ना ज़रा आहिस्ता से 

प्यार की इक किताब है औरत


इस जहां के हज़ार कांटों में

इक महकता गुलाब है औरत


इसमें दुर्गा, इसी में मीरा भी

आधी दुनिया की आब है औरत


जोड़, बाकी, बटा, गुणा "वर्षा"

ज़िन्दगी का हिसाब है औरत



रविवार, मार्च 07, 2021

औरतें | 08 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

ग़ज़ल
औरतें
-डॉ. वर्षा सिंह

सागर की लहर, झील का पानी हैं औरतें।

बहती  हुई  नदी  की   रवानी हैं औरतें।

दुनिया की हर मिसाल में शामिल हैं आज वो
‘लैला’ की, ‘हीर’ की जो कहानी  हैं औरतें।

उनका  लिखित स्वरूप  महाकाव्य की तरह
वेदों की ऋचाओं-सी  ज़ुबानी  हैं  औरतें।

मिलती हैं  जब कभी  वो  सहेली के रूप में
यादों  की  वादियों-सी  सुहानी  हैं औरतें।

‘मीरा’  बनी कभी,  तो ‘कमाली’  बनी कभी
‘वर्षा’  कहा  सभी  ने -‘सयानी हैं औरतें’।
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शुक्रवार, मार्च 05, 2021

चलते-चलते | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - दिल बंजारा

Dr. Varsha Singh
ग़ज़ल

चलते-चलते


         - डॉ. वर्षा सिंह


रंज-ओ-ग़म से नहीं बचा कोई

दर्द-ए-दिल की नहीं दवा कोई


ज़िन्दगी की उदास राहों में

है नहीं अपना आश्ना कोई


बेवजह रूठ कर जो माने ना

ऐसे होता नहीं ख़फ़ा कोई


आपसे दिल्लगी का मक़सद था

आप देते हमें सज़ा कोई


जैसे माज़ी पुकारता हो मेरा

ऐसी मुझको न दे सदा कोई


अब के मौसम में क्या हुआ, या रब!

हो गया फूल फिर जुदा कोई


यूं ही आंखों में आ गए आंसू

अब न उमड़ेगी फिर घटा कोई


उनकी यादों को नींद आ जाए

काश! ऐसी करे दुआ कोई


यूं ही चुपके से मेरे सिरहाने

आ के रख जाए फिर वफ़ा कोई


बुझ रहे हैं च़िराग, बुझ जाएं

अब न दीजे इन्हें हवा कोई


आप तक जा के ख़त्म हो जाए

ऐसा मिल जाए रास्ता कोई


मंज़िल-ए-राहे-इश्क़ में "वर्षा"

चलते-चलते नहीं थका कोई


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "दिल बंजारा" से)

गुरुवार, मार्च 04, 2021

नाम तुम्हारा | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh


नाम तुम्हारा 


   - डॉ. वर्षा सिंह


सुनते हैं सदी पहले कुछ और नज़ारा था

इस रेत के दरिया में पानी था, शिकारा था


रिश्तों से, रिवाज़ों से, बेख़ौफ़ हथेली पर

जो नाम लिखा मैंने, वो नाम तुम्हारा था


मुद्दत से मुझे कोई, बेफ़िक्र न मिल पाया 

हर शख़्स की आंखों में चिंता का पिटारा था 


दंगों ने, फ़सादों ने बस्ती ही जला डाली

जिस ओर नज़र डाली, उस ओर शरारा था

 

हैरान न अब होना, आंधी जो चली आई 

ख़ामोश उदासी ने हलचल को पुकारा था


ज़िद पार उतरने की, हो पाई नहीं पूरी

डूबी थी जहां किश्ती, कुछ दूर किनारा था


थक-हार के लोगों ने, चर्चा ही बदल डाली 

समझा न कोई कुछ भी, क्या ख़ूब इशारा था


जिस रात की आंखों में, मैं झांक नहीं पाई 

उस रात की आंखों का, हर ख़्वाब सितारा था 


मर-मर के बिताई है "वर्षा" ने उमर सारी 

कहने को हर एक लम्हा, जी-जी के गुज़ारा था 


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)


गुरुवार, फ़रवरी 25, 2021

शिव कहां | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh

शिव कहां !


- डॉ. वर्षा सिंह


कौन पढ़ता है किताबें आजकल 

वक़्त कहता 'फोर-जी' के साथ चल

 

कांपती हैं पत्तियां बीमार-सी 

अब हवा भी वायरस से है विकल 


इन दिनों लड़की से कहते हैं सभी 

हो गई है शाम, घर से मत निकल


चाहता कोई ज़रा झुकना नहीं

भूल थी, संवाद से निकलेगा हल


देखिए, फागुन में बारिश हो रही

कर लिया मौसम ने शायद दल-बदल


आंसुओं की नींव पर बनता नहीं

ख़ुशनुमा सा मुस्कुराहट का महल


जो स्वयं पर ही नहीं करते यकीं

वो कभी भी हो नहीं पाते सफल


सोचिए, कैसे मिले सदभावना 

द्वेष बो कर, द्वेष की मिलती फ़सल


दौर कैसा आ गया है, देखिए !

दोस्तों में अब नहीं होती चुहल


शिव कहां ! अब पूछती व्याकुल धरा

जो स्वयं ही कण्ठ में धारे गरल


बूंद "वर्षा" की, सभी की प्यास को 

तृप्ति देती है सदा निर्मल तरल


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)

बुधवार, फ़रवरी 24, 2021

किस तरह | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है


Dr. Varsha Singh

किस तरह


          - डॉ. वर्षा सिंह


याद उसको उसी रास्ते की कथा

जिसमें मिलती रही है व्यथा ही व्यथा 


तेज़ रफ़्तार थी ज़िन्दगी की बहुत 

काम तो थे कई किंतु अवसर न था 


जब से अस्मत लुटी एक मासूम की

देवता पर न उसकी रही आस्था


किस तरह वो तरक्क़ी करेंगे भला

जिनके पैरों में जकड़ी पुरानी प्रथा


बेवज़ह ज़िद पे अड़ने का जिनको शग़ल

बात करना भी उनसे यकीनन वृथा


सीढ़ियां आहटों से लिपटती रहीं

जो रुके ही नहीं उनमें वह एक था 


रात को नम हवा पास बैठी रही 

मेरे मन का समुंदर उसी ने मथा


जिसकी सूरत हृदय में समायी हुई

पूरी दुनिया से वो है अलग सर्वथा


बात मेरी समझ में न ये आ सकी 

प्यार को लोग लेते हैं क्यों अन्यथा !


बन के "वर्षा" झरीं, कुछ सिमट कर थमीं 

चंद बूंदों की स्थिति यथा की यथा


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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)


शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2021

और कब तक | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

Dr. Varsha Singh


और कब तक ...


          - डॉ. वर्षा सिंह


आग से भी खेलना है, राख होने का भी डर 

इस तरह पूरा न होगा, ज़िन्दगी का ये सफ़र 


तोड़ दो वह क़ैद जिसने धूप को बंदी किया

दस्तकें देते रहोगे और कब तक द्वार पर !


फूल नीले, पत्तियां काली, हवा कैसी चली !

कौन जाने लग गई इस बाग़ को किसकी नज़र


टेकना मस्तक नहीं, प्रतिकूलता के सामने 

रोशनी के वास्ते यह दीप-झंझा का समर


हो गए निष्प्राण रिश्ते, गुम हुआ अपनत्व भी

कोबरा से भी विषैला, स्वार्थपरता का ज़हर


खाईयां इतनी खुदी हैं दो दिलों के बीच में

अब नहीं आता मुझे पहचान में मेरा शहर


पड़ सके जिस पर न छाया, रंच भर अवसाद की

ढूंढ कर लायें चलो, कोई नई ताज़ा बहर 


समतलों को, घाटियों को ईर्ष्या होती रहे 

पर्वतों से प्यार "वर्षा" को रहेगा उम्र भर 



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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)