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Dr. Varsha Singh |
एक कहानी
-डॉ. वर्षा सिंह
चूम के मेरा माथा उसने, मुझ को आशीर्वाद दिया
चिंता की बहती नदिया को, सागर बनकर थाम लिया
तन की चादर में छुप जाना, मन से बाहर आ जाना
तन-मन को भीतर-बाहर से, रेशा रेशा प्यार किया
कल का वो दिन, आज का ये दिन, समय गुज़रना भूल गया
अक्षर -अक्षर चुन के मैंने, मिसरा- मिसरा ख़ूब सिया
खुद को खोना, खुद को पाना, विदा स्वयं को कर देना
अपनी ही अगवानी करना, क्या होता है जान लिया
पृथ्वी को आकाश बनाकर, एक कहानी लिख डाली
और कहानी को फिर "वर्षा", मैंने उसका नाम दिया
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 02 फरवरी को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार आदरणीय दिग्विजय अग्रवाल जी 🙏
हटाएंबहुत-बहुत आभार आदरणीय शास्त्री जी 🙏
जवाब देंहटाएंवाह!! लाजवाब ग़ज़लों का सिलसिला जारी है..बहुत खूब वर्षा जी, हार्दिक शुभकामनायें..
जवाब देंहटाएंशुक्रिया, जिज्ञासा जी 🙏
हटाएंपृथ्वी को आकाश बनाकर, एक कहानी लिख डाली
जवाब देंहटाएंऔर कहानी को फिर "वर्षा", मैंने उसका नाम दिया
लाजवाब ग़ज़ल 🌹🙏🌹
हार्दिक धन्यवाद प्रिय शरद ❤️
हटाएंवाह बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल आपके सृजन को 🙏 सादर
जवाब देंहटाएंबहुत धन्यवाद प्रिय अभिलाषा जी 🙏
हटाएंखुद को खोना, खुद को पाना, विदा स्वयं को कर देना
जवाब देंहटाएंअपनी ही अगवानी करना, क्या होता है जान लिया
वाह!!!
बहुत शुक्रिया विश्वमोहन जी 🙏
हटाएंकल का वो दिन, आज का ये दिन, समय गुज़रना भूल गया
जवाब देंहटाएंअक्षर -अक्षर चुन के मैंने, मिसरा- मिसरा ख़ूब सिया
सुन्दर ग़ज़ल....
हार्दिक धन्यवाद विकास नैनवाल "अंजान" जी 🙏
हटाएंबहुत अच्छी गजल!साधुवाद!--ब्रजेंद्रनाथ
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आदरणीय ब्रजेंद्रनाथ जी 🙏
हटाएंबहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत धन्यवाद आलोक सिन्हा जी 🙏
हटाएंसुन्दर सृजन।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आदरणीय सान्याल जी 🙏
हटाएंवाह अद्भुत मित्र जी बहुत प्यारी रचना मन में अनुराग जगाती सी।
जवाब देंहटाएंसस्नेह साधुवाद।
बहुत -बहुत आभार आपकी इस आत्मीयता हेतु.... आदरणीया कुसुम कोठरी जी 🙏
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