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Dr. Varsha Singh |
बसंती हवा
-डॉ. वर्षा सिंह
बिजलियों पर चला, चांदनी में जला
एक मन सैकड़ों जुगनुओं में ढला
खूब उतरी ढलानें, चढ़ी चोटियां
चाहतों का मगर कब रुका काफ़िला
इक नदी, दो किनारे ख़ुशी-ज़िन्दगी
बीच दोनों के है उम्र का फ़ासला
जब से बहने लगी है बसंती हवा
ख़्वाब थमते नहीं, पत्ता-पत्ता हिला
एक सपना खिला तो उजाला हुआ
देह के पार जाने का ये सिलसिला
ओढ़नी के कसीदे को है ये पता
मेरी बिंदिया में वो ही रहा झिलमिला
धूप जीने का अंदाज़ भी आ गया
राह में गुलमोहर हंस के जब भी मिला
छोड़कर नर्मदा, जा के गंगा लगा
लोग कहते हैं वर्षा का मन बावला
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह "सच तो ये है" से)
लाजवाब गजल।
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया यशवन्त माथुर जी 🙏
हटाएंसादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (1-2-21) को "शाखाओं पर लदे सुमन हैं" (चर्चा अंक 3965) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
--
कामिनी सिन्हा
प्रिय कामिनी सिन्हा जी,
हटाएंबहुत-बहुत आभार आपके प्रति 🙏
आपने मेरी पोस्ट का चयन चर्चा हेतु किया यह मेरे लिए प्रसन्नता का विषय है।
शुभकामनाओं सहित,
डॉ. वर्षा सिंह
सादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (2-2-21) को "शाखाओं पर लदे सुमन हैं" (चर्चा अंक 3965) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
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कामिनी सिन्हा
प्रिय कामिनी सिन्हा जी, पुनः बहुत-बहुत आभार !
हटाएंओढ़नी के कसीदे को है ये पता
जवाब देंहटाएंमेरी बिंदिया में वो ही रहा झिलमिला
बहुत सुंदर...
बहुत मधुर भावाभिव्यक्ति 🌹🙏🌹
बहुत धन्यवाद प्रिय बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
हटाएंबहुत सुंदर अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद अनुराधा जी 🙏
हटाएंबहुत ही सुन्दर सृजन।
जवाब देंहटाएंवाह!गज़ब दी 👌
जवाब देंहटाएंछोड़कर नर्मदा, जा के गंगा लगा
लोग कहते हैं वर्षा का मन बावला..वाह!