डॉ.वर्षा सिंह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
डॉ.वर्षा सिंह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, जुलाई 14, 2020

चुनावी समर | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
      उपचुनावों की हलचल ज़ारी है। प्रस्तुत है मेरी एक ग़ज़ल....

चुनावी समर
      - डॉ. वर्षा सिंह

फिर चुनावी समर की तैयारियां होने लगीं
फिर हवाएं बोझ नारों का यहां ढोने लगीं

फिर नई संकल्प गाथा, फिर नई विरुदावली
फिर नए जल से दिशाएं मुख मलिन धोने लगीं

चिन्ह ही पर्याय हैं अब, व्यक्ति के व्यक्तित्व के
रूप की परछाइयां पहचान फिर खोने लगीं

इश्तिहारों की धरा पर उग रहे चेहरे नए
स्वप्न जीवी कल्पनाएं चाहतें बोने लगीं

मात-शह की फिर बिछी फड़, फिर छिड़ा संग्राम है
हर जगह उद्बोधनों की खेतियां होने लगीं

खोखले वादे पहनकर झूमती अट्टालिका
सोचकर परिणाम लेकिन झुग्गियां रोने लगीं

वायदों की नींव "वर्षा" छद्म की कारीगरी
इस महल में दफ़्न हो सच्चाईयां सोने लगी

                ----------------

मंगलवार, मार्च 17, 2020

ग़ज़ल... जंग छिड़ी है कुर्सी की - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

     समसामयिक घटनाक्रमों ... वर्तमान हालातों पर आज मेरी ताज़ा ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 17 मार्च 2020 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=26639

ग़ज़ल

जंग छिड़ी है कुर्सी की
            -डॉ. वर्षा सिंह

निष्ठा पर भी दाम लगे बाज़ारों में
चमक नहीं अब शेष चुनावी नारों में

जनता की आवाज़ सुनाई दे कैसे
शोर बहुत है सत्ता के गलियारों में
         
रंगमंच पर अभी यवनिका पतन कहां!
जोश बहुत है बेशक नाटककारों में

धराशायी करने की तिकड़म जारी है
जंग छिड़ी है कुर्सी की अब यारों में

स्वार्थसिद्ध करने को ही चमकीं अक्सर
बहुत धार है जंग लगी तलवारों में

शब्द लांछित हों गर कहने-सुनने से
कर लेना कुछ बातें ज़रा इशारों में

मझधारों में नाव उलटने की साज़िश
होड़ लगी है "वर्षा" यहां किनारों में
        --------------
#ग़ज़लवर्षा
#युवाप्रवर्तक


रविवार, मार्च 15, 2020

ग़ज़ल ... उसे देखा नहीं - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

उसे देखा नहीं, अरसा हुआ है.
वो मुझसे बेवज़ह रूठा हुआ है

हरा जो बाग़ दिखता काग़ज़ों पर
हक़ीक़त में मगर उजड़ा हुआ है

लगे हैं क्लोज सर्किट राजपथ में
गली में रेप बच्ची का हुआ है

उसे भ्रम है कि दुनिया जानती है
इसी भ्रमजाल में जकड़ा हुआ है

हुए दिन- रात के चौबीस घंटे
शहर में क्या कहें, क्या-क्या हुआ है

बढ़ी है क़द्र मेरी परिचितों में
मेरा दीवान इक शाया हुआ है

दिनों के बाद अब  "वर्षा" हुई है
चलो, कुछ तो कहीं अच्छा हुआ है
        --------/-------

#ग़ज़लवर्षा
#ghazal_varsha

      मेरी इस ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 27 फरवरी 2020 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=25450


मंगलवार, जुलाई 02, 2019

ग़ज़ल ... प्यार का पहला पन्ना - डॉ. वर्षा सिंह


       मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 02 जुलाई 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=16382

प्यार का पहला पन्ना
                 - डॉ. वर्षा सिंह

यूं तो इंसां जाने कितने महाग्रंथ पढ़ जाता है।
प्यार का पहला पन्ना लेकिन, भूल न कोई पाता है।

बेहद मुश्किल सा सवाल ये, उत्तर कौन बतायेगा !
अनजाना-सा चेहरा कोई  आखिर क्यों  मन भाता है।

जिसकी आहट तक ने नाता तोड़ लिया दरवाज़े से,
अकसर हर इक सपना अपने साथ उसी को लाता है।

दीवाना कहता है कोई, कोई मजनूं कहता है,
बिना बहर की ग़ज़ल अटपटी मन ही मन जो गाता है।

कभी कभी इक लम्हा जैसे सदियों में ढल जाता है,
प्यार का ढाई आखर "वर्षा" बार-बार दोहराता है।
                -------------―

#ग़ज़लवर्षा

प्यार का पहला पन्ना - डॉ. वर्षा सिंह # ग़ज़ल यात्रा

रविवार, फ़रवरी 10, 2019

वसंत पंचमी पर हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ. वर्षा सिंह

 
Dr. Varsha Singh
🌼 वसंत पंचमी पर हार्दिक शुभकामनाएं 🌼
           मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 09.02.2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏

कृपया पत्रिका में मेरी ग़ज़ल पढ़ने हेतु निम्नलिखित Link पर जायें....
http://yuvapravartak.com/?p=9749

सुन लो, यही कहानी है।
जीवन बहता पानी है ।

जी लो आज अभी जो है
बेशक़ दुनिया फानी है।

नैट- चैट की बातों में
चिट्ठी हुई पुरानी है।

पहले लव की शेष यही
सूखा फूल निशानी है।

सबके मन को भाये जो,
मीठी बोली- बानी है।

गर वसन्त है राजा तो,
"वर्षा" ऋतु की रानी है।
        - डॉ. वर्षा सिंह


सोमवार, नवंबर 26, 2018

ग़ज़ल ... जहां पे आज रेत है - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

जहां पे आज रेत है, वहीं पे थी नदी कभी
जले थे प्रेम के दिये, हुई  थी रोशनी कभी

कहा था शाम को मिलेगा, सीढ़ियों पे घाट की
वो शाम घाट पर मगर, मुझे नहीं मिली कभी

चला रहे  हैं आरियां, वो जंगलों  की  देह पर
कटे हैं पेड़ जिस जगह, वहीं थी ज़िन्दगी कभी

उदास है किसान, कर्ज  के तले, दबा  हुआ
दुखों की छांव है वहां, रही जहां ख़ुशी कभी

डरा हुआ  है बालपन, डरी हुई  जवानियां
निडर समाज फिर बने, रहे न बेबसी कभी

अनेकता  में  एकता  ही  हमारी  शक्ति है
देशभक्ति की डगर, अलग नहीं रही कभी

जहां पे ”वर्षा” हो रही है, गोलियों की इन दिनों
वहां पे  अम्नो-चैन  की, बजेगी  बांसुरी कभी

     - डॉ. वर्षा सिंह

गुरुवार, नवंबर 22, 2018

ग़ज़ल ... सर्वनाम रह गये गुमी हैं संज्ञाएं - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

सर्वनाम रह गये, गुमी हैं संज्ञाएं
शब्द बिंब ही अर्थों को अब बहकाएं

संदर्भों ने बांध दिया संबंधों को
निर्धारित कर दी हैं सब की सीमाएं

शेष नहीं वे क्षण जो जोड़ें तन मन को
भीगे उजियालों से माथा सहलाएं

तटस्थता का राग उन्हीं ने छेड़ा है
आदत जिनकी उलझें, सबको उलझाएं

कालजयी होने का जिनको दंभ यहां
अक्सर छूटीं उनके हाथों वल्गाएं

समझौते की चर्चा झेल न पाई हैंं
निर्णय पर कायम रहने की विपदाएं

अंतरिक्ष में नीड़ भला कब बन पाए
आश्रय देती हैं भू पर ही शाखाएं

अवसरवादी सुविधा भोगी सांसों को
सहनी ही पड़ती हैं ढेरों कुंठाएं

व्यथा विरत कवि नहीं कभी भी हो पाये
“ मां निषाद” वाल्मीकि रचेंगे रचनाएं

कहते हैं आशाओं का आकाश वृहद
चुटकी भर मैंने भी भर ली आशाएं

पूरी की पूरी तस्वीर उकेरेंगी
भले अधूरी “वर्षा” की हैं रेखाएं




रविवार, नवंबर 11, 2018

रात भर खिलखिलाती रही चांदनी

Dr. Varsha Singh

चांद ने जाने चुपके से क्या कह दिया
रात भर खिलखिलाती रही चांदनी

राग मौसम ने छेड़ा अजब प्यार का
डूब  कर   गुनगुनाती   रही  चांदनी
                     - डॉ. वर्षा सिंह

#ग़ज़लवर्षा

शनिवार, अक्टूबर 20, 2018

रवि शर्मा की ग़ज़लें

Dr. Varsha Singh
बहुमुखी प्रतिभा के धनी रवि शर्मा प्रेम ज्योति फाउंडेशन के संस्थापक एवं चेयरमैन हैं । लोकोपकारक और समाजसेवी हैं। वे साथ ही बहुत अच्छे कवि भी हैं। उनकी ग़ज़लों में रूमानियत इस तरह से रची बसी है मानों फूल में ख़ुशबू, मानों झरने में बूंदें और मानों गीत में सरगम…..

ज़िन्दगी का वो फ़साना ना रहा
दिल भी अब ये दीवाना ना रहा !

भीगें बरसातों में सोचा बरसों से
आज पर मौसम सुहाना ना रहा !

बेरूखियों से लफ़्ज भी गूँगे हुए
और वो दिलकश तराना ना रहा !

परछाँईयाँ पलकों में धुँधली हुई
कनखियों का मुस्कुराना ना रहा !

क्यूँ सुनाऊँ तुमको मैं शिकवे गिले
प्यार जब अपना पुराना ना रहा !

रवि शर्मा की की ग़ज़लों में जिंदगी के इंद्रधनुषी रंग बड़ी खूबसूरती से बिखरे हुए हैं। प्रस्तुत है उनकी ये ग़ज़ल……
Ravi Sharma

बस इक लम्हा तेरी ख़ुशबू का  गुज़ारा हमने ,
ज़िन्दगी भर उसे फिर दिल में  संवारा हमने !
जब भी यादों ने ख़्वाबों से ,जगाया है हमें ,
ले के होंठों पे हँसी तुमको पुकारा हमने !
कोई कहता हमें पागल तो दीवाना भी कोई ,
किया दुनिया का यूँ हँसना भी गंवारा हमने !
वक़्त चलता गया पानी के नज़ारों की तरह ,
चाहे कितना किया कश्ती से किनारा हमने !
याद है शाम वो ठहरी तेरी पहली वो नज़र ,
तब से खोया है हर इक साँस हमारा हमने !

रवि शर्मा की ग़ज़लों में चमत्कारी ढंग से प्रेम मानों सदेह उपस्थित है। शब्द शब्द कोमल भावनाओं को मुखरित करने वाला है……
Ravi Sharma

जब भी  दिल की ज़ुबान  सुनते हैं
ख़्वाब फिर  कुछ नये से  बुनते हैं !

रात भर  देख देख  तारों को
तभ भी  लाखों में एक  चुनते हैं !

टूटा ग़र  तारा  आसमां से कभी
अपनी आँखों के  तारे  गिनते हैं !

ग़र चुभें  आँखों में  टूटे तारे कभी
पलकों से  आँसुओं को  बिनते हैं !

ग़र हुई  तार तार  रूह भी कभी
रूई हसरत की फिर से  धुनते हैं !

Ravi Sharma
रवि की ग़ज़लगोई दिल को छू लेने वाली है। वे जब ग़ज़ल कहते हैं तो जैसे अनायास ही प्रकृति से बातें करते हुए प्रेम में डूब जाते हैं। उनकी ये ग़ज़ल देखें....



ख़ुशबू आई है  हवाओं में  बहारों की तरह
जब से पाया तुझे  ख़्वाब में  यारों की तरह !

मुझको जीना है  तेरे प्यार में  बाहों में तेरी
नहीं मरना मुझे  गुमनाम  बीमारों की तरह !

तू मेरी आँखों में  खिलती है  गुलशन की तरह
और तुझे चाहूँ  दिलकश मैं  नज़ारों की तरह !

तुझको माना है  हमेशा इक  अल्हड़ सी नदी
और तेरी चाह में  ठहरा हूँ  किनारों की तरह !

अब तो आजा कभी  धीरे से तू  पहलू में मेरे
या मुझे भर ले तू  बाहों में  सितारों की तरह !

रवि शर्मा की ख़ूबसूरत ग़ज़लोंं का रसास्वादन करने के लिये इस Link पर जाया जा सकता है....
http://www.ravisharma.in/category/poetry/ghazal/
                             ---------

शुक्रवार, अक्टूबर 05, 2018

ग़ज़ल यात्रा के सहयात्री


Dr. Varsha Singh
ग़ज़ल की अपनी पृष्ठभूमि और हिंदी साहित्य की सामंती एवं दरबारी मानसिकता विरोधी प्रकृति इसका प्रमुख कारण रहा है। फ़ारसी साहित्य में विलासी राजाओं के विलास और मनोरंजन के लिए गज़लकार आशिक और माशूका की रोमैंटिक कथाओं को अभिव्यक्त करते थे। इसमें आम जनता के दुःख दर्द या प्रगतिशील चेतना की अभिव्यक्ति की कोई संभावना नहीं थी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा ने हिंदी की साहित्य परंपरा में इसे सामंती एवं दरबारी चेतना मानते हुए ऐसे विषयों को साहित्य के लिए वर्जित घोषित किया है । यही कारण है कि जब शमशेर ने पारंपरिक रूमानी संस्कार के दायरे से बाहर आकर ग़ज़ल को लोक जीवन की सच्चाई और समग्रता से जोड़ने का ‘दुस्साहस’ किया तो डॉ. राम विलास शर्मा ने यह कहकर खारिज कर दिया कि“ ग़ज़ल तो दरबारों से निकली हुई विधा है, जो प्रगतिशील मूल्यों को व्यक्त करने में अक्षम है !“ लेकिन भारतीय कवियों ने उनके इस विचार को झुठलाते हुए ग़ज़ल को भारतीय मानकों पर स्थापित ही नहीं किया बल्कि बेहद लोकप्रिय विधा बना दिया।
शमशेर बहादुर सिंह
शमशेर बहादुर सिंह की यह ग़ज़ल प्रगतिशील मूल्यों को साथ ले कर चलने में सक्षम है -
उलट गए सारे पैमाने कासागरी क्यों बाकी है।
देस के देस उजाड़ हुए दिल की नगरी क्यों बाकी है।

कौन है अपना कौन पराया छोड़ो भी इन बातों को
इक हम तुम हैं खैर से अपनी पर्दादरी क्यों बाकी है।

शायद भूले भटके किसी को रात हमारी याद आई
सपने में जब आन मिले फिर बेखबरी क्यों बाकी है।

किसका सांस है मेरे अंदर इतने पास औ इतनी दूर
इस नज़दीकी में दूरी की हम सफ़री क्यों बाकी है।

बीत गये युग फिर भी जैसे कल ही तुमको देखा हो
दिल में औ' आंखों में तुम्हारी खुशनज़री क्यों बाकी है।

शोर भजन कीर्तन का है या फ़िल्मी धुनों का हंगामा
सर पे ही लाउडस्पीकर की टेढ़ी छतरी क्यों बाकी है।

धर्म तिजारत पेशा था जो वही हमें ले डूबा है
बीच भंवर के सौदे में यह एक खंजरी क्यों बाकी है।

बुधवार, सितंबर 19, 2018

ग़ज़लों की दुनिया..... -डॉ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh
एक ही बहर और वज़न के अनुसार लिखे गए शेरों का समूह ग़ज़ल के रूप में जाना जाता है। अरबी, फारसी से निकल कर उर्दू और हिन्दी में आई ग़ज़ल अब हिन्दी, बुंदेली में भी अपनी ख़ास जगह बना चुकी है।
अब वो ज़माना नहीं रहा जब ग़ज़ल की परिभाषा होती थी.....
ऐसी पद्यात्मक रचना जिसमें नायिका के सौन्दर्य एवं उसके प्रति उत्पन्न प्रेम का वर्णन हो।
Mirza Ghalib

   ग़ज़ल का मिजाज़ बदला, और लगातार बदलता गया। लेकिन ये बदलाव अचानक नहीं आया ... इश्क़ मिजाज़ी के अशआर कहने वाले मिर्जा ग़ालिब  ने भी दुनिया के हालात पर कुछ इस तरह अपनी अभिव्यक्ति दी है ....
सबने पहना था बड़े शौक से कागज़ का लिबास,
जिस कदर लोग थे बारिश में नहाने वाले ।
अदल के तुम न हमें आस दिलाओ
क़त्ल हो जाते हैं , ज़ंज़ीर हिलाने वाले ।
   और ये शेर भी देखें....
थी खबर गर्म के ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े ,
देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ।
मीर तकी मीर

मीर कहते हैं.....
बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद
रहो
ईश्वर के प्रेम से चल कर आम आदमी के हालत तक पहुंची ग़ज़ल दुष्यंत के बाद और परवान चढ़ी।
दुष्यंत को याद किए बिना कुछ भी कहना बेमानी है....
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
सूर्यभानु गुप्त

सूर्यभानु गुप्त कहते हैं...
अपनी दुनिया के लोग लगते हैं
कुछ हैं छोटे तो कुछ बड़े हैं पेड़

उम्र भर रास्तों पे रहते हैं
शाएरी पर सभी पड़े हैं पेड़

मौत तक दोस्ती निभाते हैं
आदमी से बहुत बड़े हैं पेड़

अपना चेहरा निहार लें रुतवें
आईनों की तरह जड़े हैं पेड़

डॉ. वर्षा सिंह
और मेरी बात पर भी गौर फरमाएं....

नयन में उमड़ा जलद है ।
नभ व्यथा का भी वृहद है ।

आँसुओं से तर-बतर है
यह कथानक भी दुखद है ।

दोष क्या दें अब तिमिर को
रोशनी को आज मद है ।

नींद को कैसे मनाएँ
ख़्वाब की खोई सनद है ।

त्रासदी ‘वर्षा’ कहें क्या ?
शत्रु अब तो मेघ ख़ुद है ।
     उम्मीद है कि ग़ज़लों की दुनिया यूं ही आबाद रहेगी। नयी उम्मीद, नये कंटेंट और नयी परिभाषाओं के साथ क़दम बढ़ाती जायेगी।
      - डॉ. वर्षा सिंह

©Dr Varsha Singh

गुरुवार, जुलाई 19, 2018

इश्क़ .... डॉ.वर्षा सिंह


इश्क़ ज़मीं है इश्क़ समुंदर
इश्क़ से सारी दुनिया सुंदर
इश़्क गिराता दीवारों को
इश्क़ बसायें दिल के अंदर

          ❤ - डॉ. वर्षा सिंह

#ग़ज़लवर्षा